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कितने दिन चलेगा नीतीश और लालू का ये रिश्ता?

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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विरोधी ताक़तों को साथ लेकर चलने की कला में माहिर हो चुके हैं। यह याद दिलाने की ज़रूरत नहीं है कि 17 सालों तक वो ‘साम्प्रदायिक’ बीजेपी के साथ मज़बूती से खड़े रहे। और अब वो 'जातिवादी' राजद मुखिया लालू प्रसाद यादव के साथ यही दुहरा रहे हैं।
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उनकी पार्टी समता पार्टी (बाद में जो जनता दल-यूनाइटेड बनी) पहला राजनीतिक दल था, जिसने 1996 में बीजेपी को सेक्युलर वैधता प्रदान की। बाबरी मस्जिद तोड़े जाने के बाद के सालों में बीजेपी को राजनीतिक अछूत माना जाता था और केवल शिव सेना और शिरोमणि अकाली दल ही उसके सहयोगी हुआ करते थे।

नीतीश कुमार और जॉर्ज फ़र्नांडिस ही वो दो शख़्स थे, जिन्होंने 1998 में अन्य सेक्युलर पार्टियों के बीजेपी के साथ आने का रास्ता बनाया।

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गुजरात दंगों के दौरान नीतीश कुमार चुप रहे और यहां तक कि नरेंद्र मोदी को केंद्र में आकर बड़ी भूमिका निभाने की भी अपील की थी। अटल बिहारी वाजपेयी कैबिनेट में रहने के बाद उन्होंने बीजेपी को सहयोगी के रूप में साथ लेकर साढ़े सात साल से भी अधिक समय तक बिहार में सरकार चलाई।

बीजेपी के कुछ नेता कट्टर विचारधारा वाले थे और संघ परिवार से भी उनके मज़बूत रिश्ते थे जबकि नीतीश की पार्टी में सोशलिस्ट परिवार के उग्र सेक्युलरवादी नेता मौजूद थे। सालों तक नीतीश को दो नावों में पांव रख कर चलना पड़ा था।

लेकिन जल्द ही चीज़ें बदलने लगीं, कुछ मौक़ों पर बीजेपी और जदयू के मंत्री या नेता टेलीविज़न बहसों में झगड़ने लगे। बीजेपी के गिरिराज सिंह और तत्कालीन जदयू सांसद मोनाज़िर हसन के बीच इसी तरह की एक ज़ुबानी जंग आज भी मेरे ज़हन में है।

उस समय के जदयू प्रवक्ता और राज्यसभा के सांसद शिवानंद तिवारी अक्सर आरएसएस ब्रांड साम्प्रदायिकता की आलोचना करते रहते थे।

बीजेपी से दूरी

लेकिन 12 जून 2010 में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के अवसर पर पार्टी के बड़े नेताओं को दिया जाने वाले रात्रि भोज को रद्द किए जाने के बाद दोनों पार्टियों के बीच संबंध बहुत ज़्यादा ख़राब हो गए।

हालांकि तब विधानसभा चुनाव में चार महीने ही रह गये थे, बाद में दोनों पार्टियों ने एक होकर जीतने के लिए अपने मतभेदों को किनारे कर दिया। सीटों की साझेदारी पर भी कोई विवाद नहीं पैदा हुआ और दोनों पार्टियों ने 243 सीटों वाली विधानसभा में 206 सीटें जीतकर सरकार बनाई।

लेकिन कुछ महीनों बाद ही नीतीश और बीजेपी नेताओं के बीच दूरियां बढ़ने लगीं। उधर बीजेपी गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश कर रही थी, इसी बीच 11 अक्तूबर 2011 को नीतीश कुमार ने लाल कृष्ण आडवाणी के जन चेतना रथ को हरी झंडी दिखा दी। उस समय अपनी ही पार्टी में आडवाणी को दरकिनार किए जाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी।

गठबंधन का टूटना

नीतीश के इस क़दम से बीजेपी के अधिकांश मंत्री नाराज़ हो गए, जबकि तत्कालीन उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी बात बिगड़ने से रोकने में लगे हुए थे। इसी प्रक्रिया में उन्होंने नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में से एक बता दिया था। इस बात को लेकर उनकी ही पार्टी के अधिकांश नेताओं ने आज तक उन्हें माफ़ नहीं किया है।

आख़िरकार 16 जून 2013 को नीतीश कुमार ने बीजेपी से नाता तोड़ लिया लेकिन इससे पहले महीनों तक बीजेपी के केंद्रीय और प्रादेशिक नेताओं के साथ उनके रिश्ते बेहद कड़वे रहे।

गठबंधन तोड़ने से दो महीने पहले ही एक बार उन्होंने सार्वजनिक मीटिंग में गिरिराज सिंह पर तंज़ कसा था, जबकि वो मंच पर मौजूद थे। पिछले साल लोकसभा चुनाव हारने के बाद नीतीश कुमार ने अपने धुर विरोधी ‘बड़े भाई’ लालू प्रसाद को याद किया। और जल्द ही जनता दल यूनाइटेड ने राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के साथ हाथ मिला लिया।

लेकिन महीनों तक चले इस मेलजोल वाले संबंधों में अचानक उस समय तनाव का संकेत मिला जब अति पिछड़े जाति के कुम्हारों द्वारा 19 अप्रैल को आयोजित रैली में नीतीश नहीं पहुंचे। चूंकि इस रैली में लालू यादव को भी न्योता गया था और इसमें नीतीश की ग़ैरमौजूदगी ने ये संदेश दिया कि वो लालू के साथ मंच साझा नहीं करना चाहते।

लालू से तनातनी

एक दिन बाद ही, विरोध स्वरूप राजद के विधायकों ने बिहार विधानसभा में सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया। दो महीने बाद लालू ने जब तक सार्वजनिक रूप से नीतीश कुमार को महागठबंधन का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं घोषित कर दिया तब तक यह अशांति चलती रही थी।

हालांकि नीतीश ने एक बार फिर 21 जुलाई को एक ट्वीट कर ख़ुद मुसीबत मोल ले ली। इस ट्वीट में उन्होंने आश्चर्यजनक रूप से बिना किसी का नाम लिए लालू की सांप से तुलना कर दी थी। बाद में उन्होंने सफ़ाई दी कि उनका मतलब बीजेपी से था।

लेकिन जिस तरह 2010 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी और जदयू ने एक दुश्मन को हराने के लिए अपने सारे मतभेद किनारे कर दिए थे, इस बार भी नीतीश और लालू सार्वजनिक रूप से एक दूसरे का समर्थन कर रहे हैं या विवादित मुद्दों पर चुप्पी साध गए हैं।

साल 2010 में जिस तरह बीजेपी ने अपने पारंपरिक वोट बैंक को संगठित करने के लिए अपना साम्प्रदायिक कार्ड खेला, नीतीश कुमार ने ख़ुद को सेक्युलरवाद और विकास के चैंपियन के रूप में पेश किया और इस तरह मुस्लिमों का अच्छा ख़ासा वोट आकर्षित करने में सफल रहे।
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अब लालू से दूरी

अब 2015 के चुनाव में नीतीश कुमार पिछड़े वर्ग के वोटों को आकर्षित करने के लिए लालू को खुले तौर पर जाति का कार्ड खेलने की इजाज़त देंगे और वो ख़ुद लालू से दूरी बनाए रखने की कोशिश करेंगे ताकि ऊंची जाति के कुछ वोटरों को लुभा सकें, जो अभी भी उनके प्रशंसक हैं।

यह बात 30 अगस्त को पटना में हुई स्वाभिमान रैली में साफ़ हो गई थी जबकि 27 सितम्बर को राघोपुर में अपने सबसे छोटे बेटे के प्रचार के साथ जब लालू ने चुनाव प्रचार की शुरुआत की तो इसमें भी यह बात साफ़ दिखी।

इसमें कोई शक नहीं कि अतीत में भी नीतीश कुमार ने दोधारी तलवार पर चलने में सफलता पाई है, लेकिन लंबे समय तक साथ रहने के बाद अंततः उन्हें बीजेपी को गुडबॉय करना पड़ा था।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस बार लालू यादव के साथ उनका रिश्ता कितने दिनों तक चलेगा?

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