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बिहार: नेपाल राजघराने से जुड़ा गयाजी के ‘लाल मोहरिया पंडों’ का इतिहास, जानें जम्होर के राजपुरोहितों की कहानी

Sat, 26 Sep 2026 07:38 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गया

सार

गयाजी के लाल मोहरिया पंडों का इतिहास नेपाल के राजघराने से जुड़ा बताया जाता है। वहीं औरंगाबाद के जम्होर में भी नेपाल राजघराने के राजपुरोहित पंडों के वंशज आज तक पिंडदान की परंपरा निभा रहे हैं।
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जम्होर में श्रद्धालुओं से पिंडदान कराते नेपाल राजघराने के पुनपुन तीर्थ राजपुरोहित - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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बिहार की अंतर्राष्ट्रीय मोक्षनगरी गयाजी में पितरों को मोक्ष दिलाने का पखवाड़ा पितृपक्ष चल रहा है। पितृपक्ष में पितरों को मोक्ष दिलाने के उद्देश्य से किए जाने वाले पिंडदान में पंडा-पुरोहितों की अहम भूमिका सर्वविदित है। यही पंडे देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं को पिंडदान कराते हैं। पिंडदान की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। सदियों से चली आ रही इस परंपरा में पंडों के पूर्वजों ने देश-विदेश के हिंदू राजाओं के वंशजों से उनके पूर्वजों के पिंडदान के कर्मकांड संपन्न कराए हैं। प्राचीन परंपरा के अनुसार, जब कोई राजा अपने पूर्वज का पिंडदान करने आते थे, तो वे कर्मकांड संपन्न कराने वाले पंडे को अपने राज्य का राजपुरोहित पंडा घोषित करते थे। इस आशय की घोषणा का वे दस्तावेजी प्रमाण भी दिया करते थे। यही प्रमाण राजवंशों के परिवार का पिंडदान कराने वाले पंडों के वंशजों ने सुरक्षित रखे हैं, जिनके आधार पर ये आज भी खुद को उस राजा के राजपुरोहित पंडा के रूप में स्थापित किए हुए हैं। इसी आधार पर आज भी इन संबंधित पंडों को उस राज्य के राजपुरोहित पंडा का दर्जा मिला हुआ है और उस प्राचीन राजवंश से ताल्लुक रखने वाले परिवार आज भी अपने पूर्वजों का पिंडदान इन्हीं पंडों से संपन्न कराते हैं। गयाजी के राजपुरोहित पंडों में एक नाम लाल मोहरिया पंडों का भी आता है, जिनकी पहचान पड़ोसी देश नेपाल के राजघराने के वंशजों का पिंडदान कराने से जुड़ी है।
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गयाजी ही नहीं, औरंगाबाद में भी लाल मोहरिया पंडे
लाल मोहरिया पंडे सिर्फ गयाजी में ही नहीं हैं, बल्कि पितृपक्षीय श्राद्ध-तर्पण के प्रवेश द्वार के रूप में पुराणों में आदि गंगा के रूप में वर्णित गयाजी पिंडदान की प्रथम वेदी पुनपुन नदी के तट पर बसे औरंगाबाद के जम्होर में भी विद्यमान है।

जम्होर के पंडों का भी है लाल मोहरिया पंडों जैसा सम्मान
दरअसल, पंडा समाज में 'लाल मोहरिया पंडा' (जिन्हें बोलचाल में 'मोहरिया पंडा' कहा जाता है) का इतिहास राजा-महाराजाओं और राजशाही के दौर से जुड़ा हुआ है। यह गयाजी के मूल गयावाल पंडा समाज का एक प्रतिष्ठित पंडा घराना है। गयाजी के विष्णुपद क्षेत्र में रहने वाले गयापाल पंडों को उनकी विशिष्टताओं, ऐतिहासिक घटनाओं या राजाओं से मिले उपहारों के आधार पर अलग-अलग उपनाम (टाइटल) मिले हैं। इसी प्रकार औरंगाबाद के जम्होर में भी नेपाल राजघराने के राजपुरोहित पंडे हैं और उन्हें भी लाल मोहरिया पंडों जैसा ही सम्मान हासिल है।
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राजा-महाराजा करते थे राजपुरोहितों की घोषणा
पुराने समय में जब देश के राजा-महाराजा (जैसे नेपाल नरेश, ग्वालियर, इंदौर या गुजरात की रियासतें) गयाजी में अपने पूर्वजों का पिंडदान करने आते थे, तो वे खुश होकर अपने कुल पुरोहित (पंडा जी) को ताम्रपत्र, दान-पत्र या विशेष अधिकार देते थे। जिन पंडों को राजघराने की तरफ से 'लाल मोहर' (शाही मुहर या आधिकारिक राजकीय प्रमाण) लगाकर यजमानों की सेवा और विशेष अधिकार सौंपे गए, वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी 'लाल मोहरिया' या 'मोहरिया' पंडा के नाम से विख्यात हो गए।

राजघरानों का तीर्थ प्रबंधन देखते थे राजपुरोहित
ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, लाल मोहरिया पंडों के पास सदियों से नेपाल के राजघराने (राणा और शाह वंश) और वहां के नागरिकों के तीर्थ प्रबंधन व पिंडदान का मुख्य जिम्मा रहा है। सन् 1833 और उससे भी पहले के रिकॉर्ड के अनुसार, नेपाल से आने वाले राजा और आम श्रद्धालु गयाजी तीर्थ में इन्हीं मोहरिया पंडों की देखरेख में अनुष्ठान संपन्न कराते थे। इसी प्रकार जम्होर के पुनपुन तीर्थ के राजपुरोहित के वंशज आज भी नेपाल से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए पिंडदान का विधान संपन्न कराते हैं।

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गयाजी के मोहरिया पंडों के पास हैं सैकड़ों साल पुरानी पोथी, जम्होर के पंडों के पास इस कारण नहीं
मोहरिया पंडों के पास सैकड़ों साल पुरानी 'पंडा पोथी' (बही-खाता) भी मौजूद है। इन पोथियों में उनके यजमानों के पूर्वजों के नाम, हस्ताक्षर, उनके राज्य/गांव का नाम और तिथि दर्ज होती है। यदि कोई व्यक्ति पीढ़ियों बाद भी गयाजी आता है, तो मोहरिया पंडा अपने बही-खाते से उसके परदादा या उनके भी पूर्वजों के हाथ से लिखे अक्षर और तारीख ढूंढ निकालते हैं। वहीं जम्होर के पंडों के पास भी ऐसी पोथियां पहले उपलब्ध थीं, जो अब नहीं हैं। कारण यह कि 1976 में पुनपुन नदी में आई बाढ़ में वे पोथियां बहकर नष्ट हो गईं और नई पीढ़ी ने पोथी रखना बंद कर दिया।

ब्रह्माजी द्वारा कल्पित ब्राह्मण माने जाते हैं पिंडदान कराने वाले पंडे
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, गयाजी के पंडा समाज को ब्रह्मा जी द्वारा कल्पित ब्राह्मण माना जाता है और मोहरिया पंडा इसी समाज का अंग हैं, जो आदिकाल से गयासुर राक्षस को मिले वरदान और भगवान विष्णु के चरण चिह्नों (विष्णुपद मंदिर) की साक्षी में पिंडदान की सनातन परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।

औरंगाबाद के जम्होर में भी हैं नेपाल राजघराने के राजपुरोहित पंडे, फर्क यह
औरंगाबाद के जम्होर में भी नेपाल राजघराने के राजपुरोहित पंडों के वंशज मौजूद हैं। ये आज भी खुद को नेपाल राजघराने का राजपुरोहित पंडा बताते हैं। इसी वंश से ताल्लुक रखने वाले जम्होर के विष्णुधाम तीर्थ के पंडा कुंदन पाठक बताते हैं कि उनके स्वर्गीय पूर्वज पंडित दीनदयाल पाठक दीनदयाल बाबा के रूप में जाने जाते थे। समाज में उनकी प्रतिष्ठा विद्वान और कुलीन ब्राह्मण के रूप में थी। उन्होंने ही नेपाल के राजा त्रिभुवन वीर विक्रम शाह के हाथों उनके पूर्वज पितरों को जम्होर के पास पुनपुन नदी के विष्णुधाम घाट पर प्रथम पिंड दिलाया था।

गरीब पहाड़ी का वेश धारण कर पितरों को मोक्ष दिलाने पुनपुन नदी के विष्णुधाम घाट पर आए थे नेपाल नरेश
पंडित कुंदन पाठक बताते हैं कि उनके दादा स्व. राधाकृष्ण पाठक ने अपने जीवनकाल में उन्हें बताया था कि 1927/28 में नेपाल के तत्कालीन राजा त्रिभुवन वीर विक्रम शाह अपने मुख्य सुरक्षा अधिकारी युद्ध शमशेर के साथ बिल्कुल ही गरीब पहाड़ी के वेश में पितरों का पिंडदान करने गयाजी धाम आए थे। गयाजी धाम में पिंडदान करने के पहले उन्होंने पुनपुन तीर्थ जम्होर में विष्णुधाम आकर पूर्वजों को पुनपुन नदी में प्रथम पिंड दिया था।

कौव्वल की प्रथा में फिट नहीं बैठ रहे थे नेपाल नरेश
उस समय गयाजी धाम और पुनपुन तीर्थ, जम्होर में कौव्वल (कौल) की प्रथा थी। इस प्रथा के तहत पंडागण पिंडदान का कर्मकांड कराने से पहले यजमान से दक्षिणा का निर्धारण कराते थे, यानी पंडा यह कहते थे कि यजमान, आपका कार्य संपन्न कराने पर हमें क्या प्राप्त होगा? इसे ही कौव्वल (कौल) कहा जाता था। चूंकि नेपाल नरेश ने गरीब पहाड़ी के वेश में अपनी पहचान छिपा रखी थी। इस कारण गयाजी के पंडों ने नेपाल नरेश को भी सामान्य पिंडदानी समझकर उनसे भी कौव्वल की बात की। नेपाल नरेश ने पिंडदान कराने के लिए कई पंडों से संपर्क किया। हर पंडे ने उनसे यही प्रश्न किया कि यजमान क्या देंगे? इस दौरान एक सहृदय पंडा यह कहते हुए पिंडदान कराने को राजी हो गए कि यजमान, आप जो भी देना स्वीकार करेंगे, उसे लेकर वे उनके पूर्वजों का पिंडदान करा देंगे।

सवा सेर जौ पर तय हुआ पिंडदान कराना
इस पर गरीब पहाड़ी का वेश धारण किए नेपाल नरेश ने मैले-कुचैले छोटे से थैले को दिखाते हुए कहा कि पंडा महाराज, हमारे पास इस थैले में सवा सेर जौ है, जिसे मैं आपको दक्षिणा के रूप में दे सकता हूं। उनके इस वचन पर पंडा महाराज पिंडदान कराने को यह कहते हुए राजी हो गए कि यजमान, चूंकि गया श्राद्ध-तर्पण के पौराणिक विधान में प्रवेश द्वार पुनपुन नदी में ही पूर्वजों को प्रथम पिंड देने के बाद गयाजी की पिंडदान वेदियों पर पिंडदान का प्रावधान है। इसलिए यजमान, आप पुनपुन की व्यवस्था स्वयं देख लें। वहां से वापस आने पर पिंडदान करा देंगे। इस पर सहमत होने के बाद नेपाल नरेश प्रथम पिंडदान करने पुनपुन नदी के लिए रवाना हो गए।

दीनदयाल बाबा ने पुनपुन नदी के विष्णुधाम घाट पर नेपाल नरेश के पूर्वजों को दिलाया था प्रथम पिंड
इसके बाद गरीब पहाड़ी वेशधारी नेपाल नरेश पुनपुन नदी के जम्होर स्थित विष्णुधाम घाट पहुंचे। यहां भी उनके साथ कौव्वल की स्थिति उत्पन्न हुई। यहां भी बिना दक्षिणा के कोई भी ब्राह्मण पिंडदान कराने को राजी नहीं हुआ। इसी दौरान दीनदयाल बाबा बिना दक्षिणा लिए पिंडदान कराने को राजी हो गए। उन्होंने पिंडदान कराया, जिसके बाद पहाड़ी गरीब वेशधारी राजा ने उन्हें दक्षिणा में एक छड़ी दी और उन्हें प्रणाम किया। बाबा ने भी उन्हें बड़ी प्रसन्नता से आशीर्वाद देकर विदा किया। इसके बाद वे गयाजी धाम चले गए, जहां समस्त पिंडदान विधान संपन्न कर वहां के पूर्व नियत पंडा को दक्षिणा में सवा सेर जौ से भरी थैली देकर नेपाल वापस चले गए।

स्थानीय ब्राह्मणों ने बनाया दीनदयाल बाबा का मजाक, नदी में फेंक दी छड़ी
वहीं, पहाड़ी गरीब वेशधारी राजा के जाने के बाद स्थानीय ब्राह्मणों में हास्य-व्यंग्य चलने लगा। ब्राह्मणों ने दीनदयाल बाबा पर व्यंग्य करते हुए कहा कि यजमान ने छड़ी दी है, बाबाजी इसे अच्छे से संभाल कर रखिएगा। यह सुनकर दीनदयाल बाबा कुपित हो गए और उन्होंने बाढ़ से उफनती पुनपुन नदी में छड़ी फेंक दी।

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सप्ताह बीतने पर नेपाल नरेश ने गयाजी बुलाया
पुनपुन नदी में छड़ी फेंकने के सप्ताह भर बाद उन्हें संदेशवाहक से संदेश मिला कि छड़ी देने वाले यजमान साधारण नहीं, बल्कि नेपाल के राजा थे और उन्होंने उन्हें गयाजी बुलाया है। बुलावे पर दीनदयाल बाबा बड़े प्रसन्न हृदय से गयाजी धाम पहुंचे, जहां नेपाल नरेश ने उनसे पूछा कि पंडित जी, दान वाली छड़ी कहां है? इस पर दीनदयाल बाबा ने उन्हें बताया कि मैंने छड़ी को पुनपुन नदी में प्रवाहित कर दिया।

नेपाल नरेश ने की दीनदयाल बाबा को पुनपुन तीर्थ का राजपुरोहित बनाने की घोषणा
इस पर नेपाल के राजा ने दोनों हाथ जोड़कर कहा कि महाराज, हमें क्षमा करो, आप विद्वान हैं। धन की लालसा से रहित हैं, परंतु आपने हमारे दान का मान नहीं रखा। पंडित जी, उस छड़ी के भीतर भी प्रचुर मात्रा में स्वर्ण था, परंतु अब कुछ नहीं हो सकता। एक कर्मकांड के लिए दोबारा दक्षिणा देना भी विधानसम्मत नहीं है। आपको दोबारा दक्षिणा नहीं देते हुए भी आपकी सहृदयता को देखते हुए मैं आपको पुनपुन तीर्थ का अपना राजपुरोहित स्वीकार करता हूं। मेरे वंशज भी आपको अपने पुनपुन तीर्थ राजपुरोहित के रूप में स्वीकार करेंगे। मेरे वंशज और नेपाल की प्रजा आगे जब भी पूर्वजों को प्रथम पिंड देने पुनपुन तीर्थ आएंगे, आप ही के वंशजों से पुनपुन तीर्थ राजपुरोहित के रूप में कर्मकांड संपन्न कराएंगे। चूंकि आपने मेरे दंड (छड़ी) को साधारण छड़ी समझकर नदी में प्रवाहित कर दिया है। इस कारण मैं आपको राजपुरोहित पंडा होने का लिखित राज्यादेश नहीं दे रहा हूं।इसके बाद दीनदयाल बाबा बुझी मन से घर वापस लौट आए। इस घटना से उन्हें काफी मानसिक आघात हुआ और कुछ समय में वे गोलोकवासी हो गए।
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नेपाल नरेश ने पिंडदान कराने वाले गयाजी के पंडा को दिया लाल मुहर लगा पट्टा, इस कारण लाल मोहरिया पंडा कहे जा रहे वंशज
वहीं, नेपाल नरेश द्वारा दक्षिणा में दिए गए सवा सेर जौ वाले थैले को गयाजी के पंडे ने सुरक्षित रखा था, जिसे राजा के समक्ष प्रस्तुत किए जाने पर थैले से सवा सेर सोने के जौ निकले, जो पंडा जी को प्राप्त हुए। इस पर नेपाल के राजा ने कहा कि आपने मेरे दान का मान रखा है। इसलिए मैं आपको भी गयाजी धाम का तीर्थ राजपुरोहित स्वीकार करते हुए लिखित आदेश पारित करता हूं। इसी लिखित आदेश को लाल मोहरिया पट्टा के नाम से जाना गया। इसी वजह से नेपाल नरेश के पूर्वजों का पिंडदान कराने वाले पंडे के वंशज लाल मोहरिया पंडा के रूप में जाने जाते हैं। नेपाल नरेश के इसी आदेश के आलोक में राजघराने के वंशज और नेपाल की समस्त जनता इन्हीं मोहरिया पंडों के सानिध्य में गयाजी श्राद्ध का विधान संपन्न कराते हैं।

वहीं, नेपाल नरेश के मौखिक राज्यादेश के आलोक में दीनदयाल बाबा के वंशजों में चंदन पाठक, कुंदन पाठक और अन्य परिवारजनों द्वारा आज भी पूर्वजों की परंपरा का निर्वहन करते हुए यथाशक्ति दक्षिणा पर अन्य श्रद्धालुओं के साथ ही नेपाल से आने वाले श्रद्धालुओं के पूर्वजों का विधिपूर्वक पिंडदान नेपाल नरेश के राजपुरोहित के रूप में कराया जाता है।

 

 

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