गयाजी के पितृपक्ष मेले में पिंडदान और श्राद्ध के साथ मानव सेवा की मिसाल भी देखने को मिल रही है। पंजाब के बठिंडा की विष्णुपद सेवा संघ सोसायटी की ओर से चलाए जा रहे नि:शुल्क लंगर में रोजाना चार से पांच हजार श्रद्धालु भोजन करते हैं। पूरे मेले में करीब 60 से 70 हजार श्रद्धालुओं को लंगर का लाभ मिलने का अनुमान है।
विश्व प्रसिद्ध गयाजी पितृपक्ष मेले में जहां लाखों श्रद्धालु अपने पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना से पिंडदान कर रहे हैं, वहीं मानव सेवा की अनूठी मिसाल भी देखने को मिल रही है। पंजाब से आने वाले सेवादार वर्षों से नि:स्वार्थ भाव से लंगर चलाकर श्रद्धालुओं को भोजन करा रहे हैं। उनका मानना है कि गयाजी में पितरों की सेवा के साथ भूखे श्रद्धालुओं को भोजन कराना भी सबसे बड़ा पुण्य है।
पितरों की सेवा के साथ मानवता का भी संगम
भोजन की परेशानी देख शुरू की सेवा
सोसायटी के अध्यक्ष विजय कुमार गुप्ता बताते हैं कि वर्ष 2014 में जब वे पहली बार पिंडदान के लिए गयाजी पहुंचे थे, तब उन्होंने देखा कि कई श्रद्धालु भोजन के लिए परेशान हो रहे हैं। उसी अनुभव ने उनके मन में सेवा का भाव जगाया। अगले ही वर्ष उन्होंने अपने साथियों के साथ गयाजी में लंगर शुरू किया, जो आज हजारों श्रद्धालुओं के लिए सहारा बन चुका है।
हर दिन हजारों श्रद्धालु ग्रहण करते हैं प्रसाद
सेवा ही सबसे बड़ा धर्म
सेवादारों का कहना है कि गयाजी में पितरों के निमित्त किया जाने वाला श्राद्ध और पिंडदान सनातन परंपरा का महान अनुष्ठान है। ऐसे में दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं को बिना किसी भेदभाव के भोजन कराना उनके लिए ईश्वर की सेवा के समान है। उनका उद्देश्य केवल इतना है कि कोई भी श्रद्धालु भूखा न रहे और पूरी श्रद्धा के साथ अपने धार्मिक कर्तव्य का पालन कर सके।
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पंजाब से आता है पूरा इंतजाम
लंगर के संचालन के लिए अधिकांश राशन, मसाले और आवश्यक सामग्री पंजाब के बठिंडा से ही लाई जाती है। भोजन तैयार करने में गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखा जाता है, ताकि श्रद्धालुओं को स्वच्छ, स्वादिष्ट और पौष्टिक भोजन मिल सके। बड़ी संख्या में सेवादार पूरे मेले के दौरान निस्वार्थ भाव से अपनी सेवाएं देते हैं।
गयाजी की पहचान बनी सेवा की परंपरा
गयाजी में पितृपक्ष मेला केवल पिंडदान और श्राद्ध का आयोजन नहीं, बल्कि सेवा, करुणा और समर्पण की जीवंत परंपरा का भी प्रतीक है। यहां एक ओर श्रद्धालु अपने पितरों के मोक्ष की कामना करते हैं, तो दूसरी ओर नि:स्वार्थ सेवा में लगे लोग मानवता की मिसाल पेश करते हैं। यही कारण है कि गयाजी की यह परंपरा श्रद्धालुओं के मन में आस्था के साथ सेवा का संदेश भी छोड़ जाती है।