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गयाजी: पितृपक्ष मेले में 16 वेदी पर उमड़ी आस्था, जानिए यहां पिंडदान और गजकर्ण तर्पण का महत्व

Thu, 01 Oct 2026 08:59 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गया जी

सार

गयाजी पितृपक्ष मेले के सातवें दिन और गया श्राद्ध के छठे दिन विष्णुपद मंदिर परिसर स्थित 16 वेदी मंडप श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। आश्विन कृष्ण षष्ठी के अवसर पर देश-विदेश से आए हजारों पिंडदानी यहां वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पिंडदान और तर्पण कर रहे हैं। धार्मिक मान्यता है कि 16 वेदियों पर विधि-विधान से पिंडदान करने और दूध से गजकर्ण तर्पण करने से पितरों को मोक्ष तथा विष्णुलोक की प्राप्ति होती है।
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गयाजी का विष्णुपद मंदिर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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विश्व प्रसिद्ध गयाजी पितृपक्ष मेले के सातवें दिन और गया श्राद्ध के छठे दिन श्रद्धालु विष्णुपद मंदिर परिसर स्थित 16 वेदी मंडप में पिंडदान और तर्पण कर रहे हैं। धार्मिक मान्यता है कि यहां विधि-विधान से पिंडदान और दूध से गजकर्ण तर्पण करने पर पितरों को मोक्ष तथा विष्णुलोक की प्राप्ति होती है। आश्विन कृष्ण षष्ठी के अवसर पर सुबह से ही देश-विदेश से आए हजारों पिंडदानी अपने पितरों के निमित्त इन वेदियों पर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच श्राद्ध कर्म कर रहे हैं।
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16 वेदी मंडप में पिंडदान का खास महत्व
विष्णुपद मंदिर के ठीक बगल में स्थित 16 वेदी मंडप का सनातन परंपरा में विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। पुराणों में वर्णित मान्यता के अनुसार यहां श्रद्धापूर्वक किए गए कर्मकांड से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और उन्हें विष्णुलोक प्राप्त होता है। इसी धार्मिक आस्था के कारण पितृपक्ष के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और अपने पूर्वजों के निमित्त पिंडदान व तर्पण करते हैं।

दूध से गजकर्ण तर्पण की भी मान्यता
16 वेदी मंडप में पिंडदान के साथ-साथ दूध से गजकर्ण तर्पण करने का भी विशेष विधान बताया गया है। गयापाल पंडों के अनुसार यह अनुष्ठान पितरों की आत्मा की शांति और उनके मोक्ष के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। इसी कारण आश्विन कृष्ण षष्ठी की तिथि पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस विशेष कर्मकांड में शामिल होते हैं और विधि-विधान से तर्पण करते हैं।
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मोक्ष का द्वार मानी जाती हैं 16 पवित्र वेदियां
विष्णुपद मंदिर परिसर में स्थित 16 वेदियों का धार्मिक महत्व अलग-अलग बताया गया है। मान्यता है कि इन वेदियों पर विधि-विधान से पिंडदान और तर्पण करने से पितरों के मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। इन वेदियों में दक्षिण अग्निपथ, कार्तिक पद, अग्निपद, संध्या अग्निपद, सूर्य पद, गणेश पद, चंद्र पद और उदीची पद सहित कुल 16 पवित्र वेदियां शामिल हैं। यहां अलग-अलग विधियों के अनुसार कर्मकांड संपन्न कराया जाता है।

ब्रह्माजी के महायज्ञ से जुड़ी है पौराणिक कथा
16 वेदी मंडप की उत्पत्ति को लेकर पुराणों में एक विशेष कथा का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि जब ब्रह्माजी ने गयासुर के शरीर पर महायज्ञ किया था, तब उन्होंने 16 देवताओं का आह्वान किया था। सभी देवता यज्ञ में उपस्थित हुए। उनके प्रतीक स्वरूप यहां 16 पिंड वेदियों की स्थापना की गई। तभी से इन वेदियों पर पिंडदान और तर्पण की परंपरा चली आ रही है।

गयापाल पंडा ने बताया 16 वेदियों का महत्व
गयापाल पंडा बल्लू मउआर ने बताया कि आश्विन कृष्ण षष्ठी की तिथि पर 16 वेदी मंडप में पिंडदान करने का विशेष विधान है। यहां प्रत्येक वेदी का अपना अलग धार्मिक महत्व है। इन वेदियों पर पिंडदान और तर्पण करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है तथा विष्णुलोक मिलने की मान्यता है। यही कारण है कि इस दिन देश के विभिन्न राज्यों से आए हजारों श्रद्धालु अपने पूर्वजों के निमित्त यहां विधि-विधान से श्राद्ध कर्म संपन्न करते हैं।
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