बिहार के गया जिले के वजीरगंज प्रखंड स्थित हसरा गांव में मौजूद हंसराज पर्वत इन दिनों फिर चर्चा में है। स्थानीय ग्रामीणों का दावा है कि हर मानसून के दौरान इस पहाड़ की तलहटी और आसपास के खेतों में बारिश के पानी के साथ चमकीले और कीमती पत्थर बहकर आते हैं। इन्हीं पत्थरों की तलाश में गांव के बच्चे, युवा और बुजुर्ग घंटों तक पहाड़ी के आसपास खोजबीन करते हैं।
हालांकि, इन दावों की अब तक किसी स्वतंत्र वैज्ञानिक संस्था ने पुष्टि नहीं की है। करीब 150 घरों और लगभग एक हजार की आबादी वाला हसरा गांव हर साल बारिश का बेसब्री से इंतजार करता है। ग्रामीणों के लिए मानसून सिर्फ खेती का मौसम नहीं, बल्कि उम्मीद और किस्मत बदलने का समय भी माना जाता है।
बारिश की पहली तेज धार के साथ शुरू हो जाती है पत्थरों की तलाश
ग्रामीणों का कहना है कि तेज बारिश के बाद पहाड़ की मिट्टी और चट्टानों के साथ कई तरह के चमकीले पत्थर नीचे बहकर आते हैं। स्थानीय भाषा में इन्हें 'मनिया' या 'मुंगा का पत्थर' कहा जाता है। लोगों का दावा है कि इनमें से कुछ पत्थर हजारों से लेकर लाखों रुपये तक में बिक जाते हैं।
'पत्थर मिलते ही पूरे गांव में फैल जाती है खबर'
हसरा गांव निवासी विनोद कुमार बताते हैं कि करीब दस वर्ष पहले गांव में पहली बार कीमती पत्थर मिलने की चर्चा जोर पकड़ने लगी थी। जब किसी को पत्थर मिलता है तो पूरे गांव में खबर फैल जाती है। उनके अनुसार, राजगीर के लाल बाबा और बोधगया के कुछ लोगों ने ग्रामीणों को इन पत्थरों की पहचान के बारे में जानकारी दी थी। तब से हर बारिश में लोग पहाड़ की ओर निकल पड़ते हैं। विनोद बताते हैं कि उन्हें खुद पत्थर नहीं मिला, लेकिन उन्होंने कई ग्रामीणों को इन्हें बेचते देखा है। उनके मुताबिक, बड़े आकार के कुछ पत्थरों की कीमत एक लाख रुपये से अधिक भी मिली है। काले, सफेद और नीले रंग के पत्थरों में बीच में अलग तरह की लाइनिंग दिखाई देती है।
'बारिश में मिला था छोटा चमकीला पत्थर'
गांव की रहने वाली करुणा देवी बताती हैं कि बारिश के दौरान उन्हें भी एक छोटा, गोल और कटा हुआ चमकीला पत्थर मिला था। वह उसे हीरा मानती हैं और आज तक उसे अपने घर में सुरक्षित रखे हुए हैं। उन्होंने बताया कि अब तक उसे बेचा नहीं है।
पूर्वजों की कहानी में पहाड़ से जुड़ा है पुराना किला
ग्रामीण राजेश कुमार बताते हैं कि पूर्वजों के अनुसार हंसराज पर्वत के आसपास कभी राजाओं का गढ़ और किला हुआ करता था। उनका कहना है कि बारिश शुरू होते ही गांव के बच्चे और बड़े सभी लोग कीमती पत्थरों की तलाश में निकल जाते हैं। उन्होंने दावा किया कि पहले उन्हें भी एक सफेद पत्थर मिला था। उनके शिक्षक औरंगजेब ने उसे मून स्टोन बताया था।
राजेश का कहना है कि उनकी मां ने वह पत्थर पहन रखा है और उन्हें इससे स्वास्थ्य लाभ महसूस हुआ। उन्होंने यह भी दावा किया कि गांव के कई लोगों ने पत्थर बेचकर मकान बनाए, बेटियों की शादी की, मोटरसाइकिल खरीदी और बच्चों की पढ़ाई कराई।
'पहाड़ की मिट्टी से निकलते हैं पत्थर'
हसरा पंचायत के मुखिया राम जतन यादव का कहना है कि पत्थर आसमान से नहीं गिरते, बल्कि बारिश के बाद पहाड़ की मिट्टी के साथ बाहर निकलते हैं। उनके अनुसार, गांव के कई बच्चों और बड़ों को मूंगा के पत्थर मिले हैं, जो लाखों रुपये तक में बिके। उन्होंने बताया कि हाल ही में किरानी मांझी के बेटे को भी ऐसा पत्थर मिला था, जिसे खरीदने के लिए बोधगया से लोग पहुंचे थे। उन्होंने यह भी बताया कि एक बार उन्हें भी खेत के लिए पहाड़ की मिट्टी लाते समय पत्थर मिला था, लेकिन खेती के औजार से वह टूट गया।
'पत्थरों से बदली कई परिवारों की जिंदगी'
ग्रामीणों का कहना है कि पहले गांव में अधिकांश परिवार कच्चे मकानों में रहते थे। समय के साथ कई लोगों ने पक्के घर बनाए हैं। उनका मानना है कि जिन लोगों को कीमती पत्थर मिले, उन्होंने उस पैसे का उपयोग मकान निर्माण, बच्चों की शिक्षा, शादी और अन्य जरूरी कामों में किया।
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बारिश में बाहर से भी पहुंचते हैं कथित खरीदार
स्थानीय लोगों के अनुसार, बारिश के मौसम में गया, बोधगया, राजगीर, बिहारशरीफ और राजस्थान सहित कई स्थानों से रत्न कारोबार से जुड़े लोग गांव पहुंचते हैं। ग्रामीणों का दावा है कि ये लोग पत्थरों की खरीदारी करते हैं। हालांकि, इन लेनदेन का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
दावों की सच्चाई पर वैज्ञानिक जांच का इंतजार
हंसराज पर्वत से मिलने वाले इन पत्थरों को लेकर गांव में कई मान्यताएं और कहानियां प्रचलित हैं। लेकिन अब तक किसी वैज्ञानिक संस्था या भूवैज्ञानिक अध्ययन ने इन पत्थरों की उत्पत्ति, गुणवत्ता या बाजार मूल्य की पुष्टि नहीं की है। इसके बावजूद हसरा गांव के लोगों के लिए हंसराज पर्वत आज भी उम्मीद, विश्वास और बेहतर भविष्य का प्रतीक बना हुआ है।