गया जिले के वजीरगंज प्रखंड का केनार गांव कभी कांसा, तांबा और पीतल के बर्तनों की चमक और कारीगरों के हथौड़े की आवाज से गूंजता था। यहां बने बर्तनों की मांग देश के बड़े शहरों तक थी। लेकिन वक्त बदला, बाजार बदला और मशीनों से बने बर्तनों ने पारंपरिक कारीगरों के सामने संकट खड़ा कर दिया। कभी करीब सौ घरों में चलने वाला यह कारोबार अब गिने-चुने परिवारों तक सिमट गया है। जिन हाथों ने पीढ़ियों तक शाही बर्तन बनाए, आज वही हाथ अपने हुनर को बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं।
कभी हर घर में बनते थे कांसा-पीतल के बर्तन
केनार गांव की पहचान ही कांसा और पीतल के बर्तनों से थी। गांव के कारीगर पीढ़ियों से इस कला को आगे बढ़ाते आ रहे थे। यहां बनने वाली थाली, कटोरा, गिलास और अन्य बर्तनों की मांग बिहार से बाहर कोलकाता, मुंबई समेत कई बड़े शहरों तक थी। लेकिन बदलते समय के साथ बाजार में मशीनों से बने सस्ते बर्तनों की भरमार हो गई। इसका सबसे बड़ा असर केनार के कारीगरों पर पड़ा। धीरे-धीरे काम कम होता गया और कई परिवारों ने मजबूरी में यह पेशा छोड़ दिया।
80 घरों का कारोबार सिमटकर दो-चार घरों तक पहुंचा
केनार गांव के कारीगर रतन साव बताते हैं कि उनके दादा-परदादा और पिता भी यही काम करते थे। एक समय गांव के करीब 80 घरों में कांसा-पीतल के बर्तन बनाने का काम होता था, लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। उन्होंने बताया कि पूंजी की कमी और बढ़ती महंगाई के कारण लोग इस काम को छोड़ने लगे हैं। अब गिने-चुने घरों में ही यह काम बचा है। अगर सरकार से मदद मिले और मशीन उपलब्ध कराई जाए तो इस रोजगार को फिर से खड़ा किया जा सकता है।
हुनर है, लेकिन साधन नहीं
कारीगर सरजू साव कसेरा बताते हैं कि पहले कांसा और पीतल के बर्तन बनाकर परिवार का खर्च आसानी से चलता था, लेकिन अब इससे घर चलाना मुश्किल हो गया है। मजबूरी में कई कारीगर दूसरे काम या फेरी लगाने लगे हैं। उन्होंने कहा, हमारे पास हुनर है, लेकिन पूंजी और आधुनिक मशीन नहीं है। सरकार मदद करे तो यह पुराना कारोबार फिर से जीवित हो सकता है।
नई पीढ़ी भी दूर हो रही कला से
कारीगर धर्मेंद्र कुमार कसेरा बताते हैं कि पहले गांव के लगभग हर घर में यह काम होता था। बड़े-बड़े थाली, कटोरा और दूसरे बर्तन बनाए जाते थे। लेकिन अब सिर्फ चार-पांच घरों में ही यह परंपरा बची है। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी इस काम में रुचि नहीं ले रही है, क्योंकि मेहनत ज्यादा है और आमदनी कम। अगर समय रहते सहायता नहीं मिली तो यह कला आने वाले दिनों में पूरी तरह खत्म हो सकती है।
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सरकारी मदद की राह देख रहे कारीगर
केनार के कारीगरों का कहना है कि अगर उन्हें आर्थिक सहायता, आधुनिक मशीन और बाजार उपलब्ध कराया जाए तो यह पुरानी कला फिर से रोजगार का बड़ा जरिया बन सकती है। आज सवाल सिर्फ एक कारोबार के बचने का नहीं है, बल्कि उस विरासत को बचाने का है, जिसे केनार गांव के कारीगरों ने पीढ़ियों से संभालकर रखा है। अगर समय रहते पहल नहीं हुई तो कांसे की वह खनक, जो कभी पूरे गांव की पहचान थी, सिर्फ यादों में रह जाएगी।