बिहार में प्रस्तावित अक्टूबर-नवंबर 2025 के विधानसभा चुनाव को लेकर गया जिले में सियासी सरगर्मी तेज हो गई है। होली के पर्व के साथ ही जिले में राजनीतिक गतिविधियां भी रंग पकड़ने लगी हैं, जहां विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता होली मिलन समारोह के जरिए जनता के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं। इस बहाने नेता चुनावी जमीन तैयार करने में जुट गए हैं और अपने समर्थकों को लामबंद करने की कवायद शुरू हो चुकी है।
भाजपा नेता बोले- टिकट नहीं मिला तो पार्टी को नुकसान
गया जिले के वजीरगंज विधानसभा क्षेत्र से बीजेपी नेता जितेंद्र प्रताप सिंह उर्फ फन्नू बाबू ने चुनावी दावेदारी की आधिकारिक घोषणा कर दी है। उन्होंने एक भव्य होली मिलन समारोह आयोजित कर न सिर्फ लोगों को आमंत्रित किया, बल्कि मौके का फायदा उठाते हुए जनता के समक्ष अपनी भावी राजनीतिक योजनाएं भी साझा कीं।
रंजीत प्रताप सिंह ने खुलकर कहा कि अगर पार्टी हमें टिकट नहीं देती है तो भाजपा इस सीट को हार जाएगी। वर्तमान विधायक वीरेंद्र सिंह से क्षेत्र की जनता नाराज है। समारोह में शामिल पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी ने भी उनके दावे को मजबूती दी है। यह आयोजन एक चुनावी शक्ति प्रदर्शन के रूप में भी देखा जा रहा है, जिससे पार्टी हाईकमान पर दबाव बनाया जा सके।
जदयू नेता बोले- इच्छा तो है कि हमें भी मिले टिकट
वहीं, दूसरी ओर जदयू के महानगर अध्यक्ष और वैश्य समाज के प्रदेश अध्यक्ष राजकुमार उर्फ राजू वर्णवाल ने भी गया-बोधगया मुख्य मार्ग पर एक निजी होटल में होली मिलन समारोह का आयोजन किया, जहां मुख्य अतिथि के रूप में केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी मौजूद रहे। समारोह में चुनावी चर्चा का पारा चढ़ा रहा।
इस मौके पर जब उनसे चुनावी मंशा को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि राजनीति करने वालों के मन में हमेशा यह भावना होती है कि उन्हें भी टिकट मिले और वे विधायक बनें। हमारी भी यही इच्छा है कि जदयू हमें टिकट दे और हम चुनाव मैदान में उतरें। उन्होंने इस समारोह के माध्यम से जनता के बीच अपनी पहचान और जनसमर्थन की ताकत को दिखाने का प्रयास किया।
गया जिले में कुल दस विधानसभा सीटें
गया जिले में कुल 10 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें गया टाउन, वजीरगंज, अतरी, बेलागंज, बोधगया, बाराचट्टी, शेरघाटी, इमामगंज, गुरूआ और टिकारी शामिल हैं। वर्तमान समय में इन सीटों पर एनडीए के पास छह और महागठबंधन के पास चार सीटें हैं। आगामी चुनाव में इस समीकरण के बदलने की पूरी संभावना है। यही कारण है कि राजनीतिक दलों ने अभी से प्रचार का तरीका बदलकर त्योहारों को भी चुनावी मंच बना लिया है।
होली मिलन से हो रहा सियासी समीकरण तय
जिले भर में होली मिलन जैसे आयोजनों ने स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि राजनीतिक दल अब केवल रैलियों तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजनों के जरिए जनमानस को साधने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इन आयोजनों में बढ़ती भीड़ और नेताओं की भाषणबाजी यह साफ कर रही है कि होली का रंग इस बार पूरी तरह चुनावी रंग में घुल गया है।