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'तो एक बार मोदी को मौका देने में क्या हर्ज है?'

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‘हम बिहारी लड़के अब किसी उद्धव या राज ठाकरे की जलालत नहीं सहना चाहते, हमारी तो आत्मा कांप जाती है जब मुंबई या महाराष्ट्र में परीक्षा देने की बात आती है। अब तो डर से बहुत लड़के परीक्षाएं देने मुंबई ही नहीं जाते।’
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यह टीस है बिहार के उन युवाओं की जो क्षेत्रवाद के जहर से प्रभावित हैं। लेकिन अब मोदी की लहर से इन युवाओं में भी विश्वास और भरोसे की एक उम्मीद जगी है। तभी तो दरभंगा के राज मैदान में मोदी का भाषण सुनने के बाद ये युवा कहते हैं कि हमें बिहार में ही विकास के अवसर मिलें ताकि हम मुंबई या और किसी जगह की ओर रुख न करें।

'मोदी को मौका देने में हर्ज क्या'

कामेश्वर संस्कृत विश्वविद्यालय के मुख्य भवन के सामने चाय की दुकान पर दिलीप कुमार यादव परीक्षा देने मुंबई गए अपने साथियों की पिटाई को याद करते हुए कहते हैं कि केंद्र में तो हमें एक ताकतवर पीएम चाहिए जो विकास कर सके और हमारी युवा उम्मीदों को पूरा करे। इसीलिए मोदी को भी एक मौका देने में हर्ज क्या है?

वहीं शहर के गुदरी बाजार चौराहे पर अल्पसंख्यक समुदाय के मोहम्मद जावेद कहते हैं कि नीतीश से कोई शिकायत नहीं मगर बात यहां भेदभाव या डर पैदा करने वाली ताकतों को शिकस्त देने की है। जाहिर तौर पर लालू यादव यहां ऐसी ताकतों को रोकने में ज्यादा सक्षम हैं। ये दोनों बयान यह बताने के लिए काफी है कि दरभंगा में सियासी गोलबंदी साफ दिख रही है। यह गोलबंदी ग्रामीण इलाकों में भी है मगर शहरी इलाकों से कुछ कम। मगर वोटों पर सस्पेंस बना हुआ है।

'कीर्ति से नहीं मोदी से उम्मीद'

सस्पेंस दरभंगा की इस प्रतिष्ठापूर्ण लड़ाई के मुख्य दावेदारों भाजपा उम्मीदवार पूर्व क्रिकेटर कीर्ति झा आजाद और राजद के मोहम्मद अली अशरफ फातमी की धड़कनों को बढ़ा रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश के खास सियासी सलाहकार संजय झा मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं।

अमेरिका से लौट कर यहीं के निवासी बन चुके डाक्टर प्रभात रंजन दास भी आप के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। कीर्ति आजाद से लगभग हर कोई नाराज दिखा। उनके खिलाफ गुस्सा होने के बावजूद भी उन्हें मोदी की संजीवनी मिलती साफ दिख रही है।

शहर के लहेरियासराय के युवा कौशलेंद्र ठाकुर हों या हरपट्टी गांव केनूनू पासवान, दोनों कहते हैं कि हमारी सड़क छह साल से नहीं बनी। कीर्ति बनवाना तो दूर कभी एक बार झांकने तक नहीं आए। मगर हम क्या करें इस बार हम कीर्ति का मुंह नहीं मोदी को देख रहे हैं। उम्मीद है मोदी विकास की पहुंच बिहार तक लाएंगे ताकि चंद हजार की नौकरियों के लिए मुंबई जाकर हमें गाली-पिटाई और अपमान का सामना नहीं करना पड़े।
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'नीतीश ने दिखाए थे हसीन सपने'

दरभंगा में कभी उद्योगों की बहार थी और दो चीनी तथा एक पेपर मिल से हजारों लोगों को रोजगार मिला हुआ था। मगर ढाई दशक से मिले बंद हैं, जिससे पलायन मजबूरी बन गया है। नीतीश ने तो उद्योग लगाने का सपना दिखाया मगर फैक्ट्री से धुंआ तक नहीं निकला।

लोगों के इस मूड से साफ है कि मोदी के नाम पर भाजपा अगड़ी जातियां ही नहीं बल्कि साहनी-निषाद, कोइरी-महतो सरीखी पिछड़ी तो रामविलास पासवान से गठबंधन के कारण दलित पासवानों में भी पैठ बना रही है। दरभंगा में मुसलमान 23, यादव 20, अन्य ओबीसी 16, ब्राह्मण 14, राजपूत-भूमिहार-कायस्थ-मारवाड़ी मिलाकर 14 और पासवान 6 प्रतिशत हैं बाकी अन्य जातियां हैं।
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