ईद-अल-अज़हा, यानी बकरीद 29 जून को मनाएंगे। इस मौके को मुस्लिम धर्म के लोग कैसे मनाते हैं और कैसे मनाना चाहिए- इसपर कई तरह की बातें इंटरनेट पर भी मौजूद हैं। लेकिन, मुस्लिम धर्म के जानकार कई बातों से इत्तेफाक नहीं रखते। ऐसे में बकरीद से जुड़े सवालों पर 'अमर उजाला’ से ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल के उपाध्यक्ष, इमारत-ए-शरिया के पूर्व महासचिव और बिहार राज्य हज कमिटी के पूर्व चेयरमैन अनीसुर रहमान कासमी ने लंबी बातचीत की। उन्होंने जो बताया, वह आगे पढ़ें-
सवाल - बकरीद की शुरुआती धार्मिक मान्यताओं से अलग, हम परंपराओं की बात करें तो क्या होना चाहिए?
- जवाब - इस मौके पर सुबह नहा-धो कर मस्जिद में विशेष नमाज अदा करनी चाहिए। यह नमाज सूर्योदय के बाद होती है। जुमे की नमाज की तरह इसमें भी इमाम जो नसीहते देते हैं, उसे सुनना चाहिए।
सवाल - बकरीद की नमाज को लेकर कुछ खास ध्यान रखने वाली बात?
- जवाब - यह नमाज मस्जिद में हो या ईदगाह या खुले मैदान में, कोशिश यह करनी चाहिए कि नमाजी अपने मुहल्ले से निकलें तो एक रास्ते से यहां पहुंचें और दूसरे रास्ते से लौटें। यह बेहद जरूरी नहीं, लेकिन कोशिश जरूर करनी चाहिए।
सवाल - बकरीद में बकरे की कुर्बानी क्या मुस्लिम धर्म के सभी लोगों को देनी चाहिए?
- जवाब - नहीं। यह मालदार लोगों के लिए जरूरी है। मालदार लोग अपनी तरफ से माल का एक हिस्सा जानवर की शक्ल में अल्लाह के नाम पर कुर्बान करते हैं।
सवाल - मालदार का क्या अर्थ है?
- जवाब -इसकी परिभाषा बेहद साफ है। जिस मुसलमान के पास साढ़े 52 तोला चांदी या साढ़े सात तोला सोना या उसके बराबर की राशि है, वह मालदार कहलाएगा। यह उसके पास किसी शक्ल में जमा हो, मालदार कहलाएगा। जिसके पास यह है, वह अपनी तरफ से कुर्बानी के लिए खर्च करेगा।
सवाल - कुर्बानी के बकरे को लेकर कोई खास प्रावधान है?
- जवाब - हां। कुर्बानी का जानवर सालभर से कम का नहीं होना चाहिए। मतलब, बच्चा नहीं होना चाहिए।
सवाल - मालदार लोग कुर्बानी करते हैं। गरीब लोगों का क्या होता है?
- जवाब - जो भी कुर्बानी देंगे, वह उसके गोश्त का तीन हिस्सा लगाएंगे- यह जरूरी है। इसमें एक हिस्सा ही उस मालदार व्यक्ति या उसके परिवार का होगा। दूसरा हिस्सा उसके दोस्त या रिश्तेदार के लिए होगा। तीसरा हिस्सा गरीब लोगों के नाम होगा। तीसरा हिस्सा किसी भी सूरत में गरीबों के बीच ही जाना चाहिए। इसे अपने लिए खर्च करना हराम है। दूसरा हिस्सा दोस्त या रिश्तेदार के लिए है तो उसे बनाकर खिला भी सकते हैं और बिना बनाए दे भी सकते हैं।
सवाल - दोस्त या रिश्तेदार की क्या परिभाषा है?
- मालदार परिवारों के दोस्त-रिश्तेदार भी अमूमन मालदार होते हैं, इसलिए इस मामले में विकल्प खुले रखे गए हैं। किसी भी कौम को मानने वाले आपने दोस्त हो सकते हैं। उन्हें बकरीद की कुर्बानी का गोश्त खिलाना गुनाह नहीं है, बल्कि यह पाक फर्ज़ है।