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मुसलमानों की तालीम और तरक्की भी बनेगा चुनावी मुद्दा?

Sun, 20 Sep 2015 03:19 PM IST
नीरज सहाय/अररिया से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
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आजाद भारत की राजनीति के 62 वर्ष में मुसलमान एक संवेदनशील मुद्दा बने रहे।सत्तारूढ दलों ने उनका वोट बैंक के रूप में बखूबी इस्तेमाल किया, लेकिन इस कौम की तालीम और तरक्की पर कोई खास तवज्जो नहीं दी। केंद्र में 10 साल तक (2004-2014) चली यूपीए सरकार बिहार के किशनगंज में अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) का कैंपस आठ साल में भी नहीं बनवा सकी।
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किशनगंज जिले में मुसलमानों की आबादी लगभग 67 प्रतिशत है। यहाँ की 17 लाख आबादी में करीब 12 लाख मुसलमानों की हिस्सेदारी है।किशनगंज संसदीय क्षेत्र का नेतृत्व कांग्रेस के सांसद मौलाना असरारुल हक कासमी करते हैं। किशनगंज जिले में चार विधानसभा क्षेत्र हैं- किशनगंज, ठाकुरगंज, बहादुरगंज और कोचाधाम।

इनमें से दो में कांग्रेस और दो में सत्तारूढ जनता दल यूनाइटेड के विधायक हैं। 2006 में सच्चर समिति की अनुशंसा पर तत्कालीन मानव संसाधन मंत्रालय ने बिहार में एएमयू की एत शाखा स्थापित करने की सलाह दी। नवम्बर, 2008 में एएमयू के तत्कालीन कुलपति
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लग गए 8 साल

डॉ.पीके अब्दुल अजीज ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को कटिहार में जमीन उपलब्ध कराने के लिए पहली चिट्ठी लिखी।केंद्र सरकार को एएमयू के वीसी से बिहार सरकार को पहली चिट्ठी भिजवाने में दो साल लग गए। नीतीश सरकार को एएमयू कैंपस के लिए किशनगंज में 224.4 एकड जमीन खोजने और उसका एग्रीमेंट करने में तीन साल (2011) लग गए।

लैंड एग्रीमेंट के दो साल बाद भी न केंद्र सरकार पैसे दे पाई और न ही कोई निर्माण कार्य शुरू हो सका।आखिरकार 2013 में बिहार सरकार के अल्पसंख्यक छात्रावास के दो भवनों में अस्थायी अकादमिक ब्लॉक, स्टडी सेंटर और छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग छात्रावासों की कामचलाऊ व्यवस्था शुरू हुई।

यूपीए सरकार के नीतिगत फैसले को जमीन पर उतरने में आठ साल लग गए।30 जनवरी, 2014 को यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गाँधी ने एएमयू कैंपस की इमारत का शिलान्यास किया।कैंपस के लिए 137 करोड रुपये मिलने थे लेकिन, ये पैसे अब तक नहीं मिले।
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नहीं है आधारभूत संरचना

कैंपस चलाने के लिए एएमयू और इसके केरल कैंपस से मदद लेनी पडी।बडी मशक्कत के बाद 2013 में दो विषयों में अकादमिक सत्र शुरू हो सका।एएमयू के किशनगंज कैंपस में देश भर से आए 135 छात्र (103 छात्र और 32 छात्राएं) हैं लेकिन, सीमांचल का सिर्फ एक छात्र ही है।

कैंपस के निदेशक डॉ। राशिद नेहाल के अनुसार, "चकला में स्थायी परिसर बन रहा है। एक ओर नदी होने की वजह से फेंसिंग की जा रही है। निर्माण कार्य के लिए मिलने वाले 137 करोड अब तक नहीं मिले।"एमबीए द्वितीय वर्ष के छात्र ओसामा बताते हैं कि, "हम यूनिवर्सिटी के मुख्य सेंटर से कटा महसूस करते हैं।

कैंपस दूरदराज के क्षेत्र में होने और पुख्ता आधारभूत संरचना के अभाव में कारगर नहीं हो पा रहा है। बिजली की भी समस्या बनी रहती है इससे पढाई में दिक्कत आती है।"
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