बिहार चुनाव में जमीनी स्तर पर चुनाव पूरी तरह जातीय समीकरणों और सामाजिक गोलबंदी का अखाड़ा बनता जा रहा है। लोगों से बात कीजिए तो कुछ अपवाद छोड़कर जवाब जातीय और सामाजिक वर्ग के मुताबिक ही मिलता है।
जातीय और सामाजिक ध्रुवीकरण इतना साफ हो गया है कि अब सरकार किसकी बनेगी, इसकी कुंजी ईबीसी यानी आर्थिक रूप से अति पिछड़ी जातियों के समर्थन पर टिकी है। वोट किसे देंगे, इस सवाल पर यह ईबीसी जातियां स्पष्ट ऐलान तो नहीं करती हैं, लेकिन ज्यादा कुरेदने पर नीतीश कुमार के प्रति इनका झुकाव जरूर नजर आ जाता है।
पटना से मसौढ़ी, जहानाबाद, वजीरगंज, अत्री, राजापाकर, पातेपुर (वैशाली), उजियार पुर, मोरवा, समस्तीपुर, सराय रंजन, मानार, राघोपुर, महुआ, मुजफ्फरपुर विधानसभाओं में घूमने, लोगों से बात करने और गांवों की खाक छानने के बाद यही तस्वीर उभरती है कि सवर्णों (ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत और कायस्थ) की पहली पसंद भाजपा है।
वहीं यादव, कुर्मी और मुसलमान महागठबंधन के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। दलितों में रामविलास पासवान की वजह से पासवान और महादलितों में जीतनराम मांझी की वजह से उनकी जाति मुसहर एनडीए के पक्ष में ज्यादा मुखर है।
अन्य दलितों में रविदास वर्ग के ज्यादातर लोग महागठबंधन के पक्ष में झुके दिखाई देते हैं तो बिहार में पिछड़े माने जाने वाले वैश्य समुदाय के बहुसंख्यक लोग भाजपा नीत एनडीए के साथ खड़े हैं।