सड़क पर एक के पीछे एक चलती साइकिलें... किसी के कंधे पर छोटा बैग तो किसी की साइकिल पर पानी की बोतल। न कोई बड़ा मंच, न लाउडस्पीकर और न ही लंबे भाषण। जहां लोग मिल रहे हैं, वहीं कुछ देर रुककर बातचीत होती है और फिर यात्रा उसी रास्ते पर आगे बढ़ जाती है। पद्मभूषण पर्यावरणविद् डॉ. अनिल प्रकाश जोशी की ‘प्रकृति पथ’ साइकिल यात्रा का यही अंदाज है। नेपाल के जनकपुरधाम से शुरू हुई करीब तीन हजार किलोमीटर की यह यात्रा अब बिहार से गुजर रही है। इसका संदेश साफ है कि प्रकृति को केवल पूजने की नहीं, बल्कि उसे बचाने की जरूरत है।
गांधी जयंती के दिन 2 अक्टूबर को नेपाल के जनकपुरधाम स्थित जानकी मंदिर से ‘प्रकृति पथ’ साइकिल यात्रा की शुरुआत हुई। 52 दिनों के इस अभियान का उद्देश्य जल, जंगल, जमीन, नदी, मिट्टी और जैव विविधता के संरक्षण को लेकर लोगों से सीधे संवाद करना है। यात्रा मधुबनी और दरभंगा से होते हुए इन दिनों समस्तीपुर पहुंची है। इसके बाद यह बेगूसराय, मुंगेर समेत बिहार के कई जिलों से होकर आगे बढ़ेगी।
जहां रुकी साइकिल, वहीं शुरू हुआ संवाद
इस यात्रा की खासियत यह है कि पर्यावरण संरक्षण का संदेश किसी बड़े मंच से भाषण देकर नहीं, बल्कि लोगों के बीच पहुंचकर दिया जा रहा है। रास्ते में ग्रामीणों, विद्यार्थियों, युवाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं से मुलाकात होती है। इस दौरान स्थानीय पर्यावरणीय समस्याओं पर बातचीत की जाती है। कहीं नदी और जलस्रोतों की स्थिति चर्चा में आती है तो कहीं भूजल, खेती, मिट्टी और बदलते मौसम को लेकर चिंता सामने आती है।
रोज 50 से 60 किलोमीटर साइकिल चलाने का लक्ष्य
यात्रा के कार्यक्रम के अनुसार रोज करीब 50 से 60 किलोमीटर साइकिल चलाने की योजना है। करीब तीन हजार किलोमीटर और 52 दिनों का यह अभियान बिहार के बाद झारखंड, उत्तर प्रदेश और आगे के क्षेत्रों से होकर गुजरेगा। यात्रा में मंजिल तक पहुंचने से ज्यादा महत्व रास्ते में लोगों तक पर्यावरण संरक्षण का संदेश पहुंचाने को दिया जा रहा है। हर पड़ाव पर स्थानीय लोगों के साथ बैठक, पर्यावरण संवाद और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इन कार्यक्रमों में स्थानीय समस्याओं को समझने के साथ लोगों को उनके समाधान में भागीदारी के लिए भी प्रेरित किया जा रहा है।
15 साल की किशोरी भी यात्रा का हिस्सा
इस यात्रा में उम्र की कोई तय सीमा नहीं है। जनकपुरधाम से रवाना हुए शुरुआती दल में 20 लोग शामिल थे। इनमें 15 साल की एक किशोरी भी है। यात्रा में डॉ. जोशी के साथ 14 शिष्यों के साइकिल से चलने की बात कही गई है। यह दल बताता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल विशेषज्ञों या किसी खास उम्र के लोगों की जिम्मेदारी नहीं है। नई पीढ़ी भी इसमें सीधे भागीदार बने, अभियान का यह महत्वपूर्ण संदेश है।
युवाओं का सवाल- विकास हो, लेकिन किस कीमत पर?
यात्रा के दौरान युवाओं से बातचीत में एक सवाल लगातार सामने आ रहा है- विकास जरूरी है, लेकिन क्या इसके लिए नदियों, खेतों, जंगलों और मिट्टी की कीमत चुकाई जा सकती है? यात्रा से जुड़े पर्यावरणीय विमर्श में विकास और प्रकृति को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय दोनों के बीच संतुलन बनाने पर जोर दिया जा रहा है। सड़क, रोजगार, उद्योग और आधुनिक सुविधाएं जरूरी हैं, लेकिन इनके साथ पानी, हवा, मिट्टी और जैव विविधता को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी भी समाज की है। डॉ. जोशी लंबे समय से स्थानीय संसाधनों और टिकाऊ विकास को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने की बात करते रहे हैं। उनकी इस यात्रा में भी स्थानीय समस्याओं को समझने और सामुदायिक भागीदारी पर जोर दिया जा रहा है।
साइकिल को ही बनाया संदेश का माध्यम
यात्रा का माध्यम भी अपने आप में पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रहा है। पर्यावरण की बात करने के लिए पेट्रोल-डीजल से चलने वाले वाहनों के काफिले के बजाय साइकिलों को चुना गया है। डॉ. जोशी साइकिल को पर्यावरण के अनुकूल परिवहन का साधन बताते हुए लोगों को अपनी जीवनशैली में बदलाव का संदेश दे रहे हैं। यात्रा में शामिल लोगों के लिए लगातार साइकिल चलाना आसान नहीं है। इसके लिए नियमित अंतराल पर आराम, पानी और ऊर्जा देने वाले भोजन की जरूरत पड़ती है। अलग-अलग पड़ावों पर स्थानीय आयोजक यात्रियों के ठहरने और भोजन की व्यवस्था में सहयोग कर रहे हैं।
‘प्रकृति को चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बनाते लोग’
डॉ. जोशी ने अपने संवादों के दौरान एक अहम सवाल उठाया है कि जब हवा, पानी, नदियां और जंगल सीधे लोगों के जीवन से जुड़े हैं तो आम लोग इन्हें सार्वजनिक विमर्श और प्राथमिकताओं का मुद्दा क्यों नहीं बनाते?
उनका कहना है कि पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं का समाधान केवल सरकार से उम्मीद करने से नहीं होगा। समाज को भी अपनी भूमिका तय करनी होगी। जल संरक्षण, प्रदूषण कम करना, नदियों को बचाना और प्राकृतिक संसाधनों का समझदारी से इस्तेमाल करना सामूहिक जिम्मेदारी है।
आगे भी अलग-अलग इलाकों में होगा जनसंवाद
जनकपुरधाम से शुरू हुई यह यात्रा बिहार के मिथिलांचल से गुजरते हुए आगे बढ़ रही है। मधुबनी, दरभंगा और समस्तीपुर के बाद बेगूसराय, मुंगेर समेत अन्य क्षेत्रों में पर्यावरण से जुड़े संवाद प्रस्तावित हैं। अलग-अलग इलाकों की पर्यावरणीय समस्याएं अलग हैं, इसलिए यात्रा में स्थानीय सवालों को भी चर्चा का हिस्सा बनाया जा रहा है। इस यात्रा का मकसद केवल साइकिल चलाकर एक जगह से दूसरी जगह पहुंचना नहीं, बल्कि रास्ते में लोगों से संवाद कर उन्हें प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति अपनी जिम्मेदारी का एहसास कराना है। यात्रा के दौरान उठ रहा सवाल यही है कि हम अपनी नदी, अपना पानी, अपनी मिट्टी और अपनी अगली पीढ़ी के लिए आखिर क्या छोड़कर जा रहे हैं?