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समस्तीपुर का अनोखा सती स्थान मंदिर: जहां प्रतिमा नहीं समाधि की होती है पूजा, नवरात्र में लगता है तीन दिन मेला

Wed, 14 Oct 2026 07:10 PM IST
दरभंगा ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, समस्तीपुर

सार

समस्तीपुर के ध्रुवगामा गांव स्थित सती स्थान करीब 600 साल पुरानी लोककथा से जुड़ा है। यहां मां सती की प्रतिमा के बजाय समाधि की पूजा होती है। नवरात्र में तीन दिवसीय मेला लगता है और नेपाल से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं।

 

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समस्तीपुर जिले के ध्रुवगामा गांव में 600 वर्षों से मूर्ति नहीं समाधि की होती है पूजा फोटो: अमर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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शारदीय नवरात्र के दौरान मां दुर्गा की आराधना के लिए मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। आमतौर पर देवी मंदिरों में मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाती है, लेकिन बिहार के समस्तीपुर जिले में एक ऐसा धार्मिक स्थल भी है, जहां मां सती की प्रतिमा के बजाय उनकी समाधि की पूजा होती है। कल्याणपुर प्रखंड के ध्रुवगामा गांव स्थित यह सती स्थान करीब 600 साल पुरानी लोककथा और परंपराओं से जुड़ा है। यहां समस्तीपुर के अलावा दरभंगा, मधुबनी, मुजफ्फरपुर सहित बिहार के विभिन्न जिलों और पड़ोसी देश नेपाल से भी श्रद्धालु दर्शन-पूजन और मन्नत मांगने पहुंचते हैं। समाधि की पूजा की परंपरा इस स्थल को विशिष्ट धार्मिक पहचान देती है।

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1430 ईस्वी से जुड़ा है सती स्थान का इतिहास
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मां सती स्थान का इतिहास वर्ष 1430 ईस्वी से जुड़ा है। प्रचलित लोककथा के मुताबिक, अगहन शुक्ल सप्तमी के दिन मंगलवार को ध्रुवगामा गांव निवासी गतिराम सिंह की मृत्यु हो गई थी। पति की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी चंद्रावती देवी ने भी उनके साथ सती होने का निर्णय लिया। बताया जाता है कि ग्रामीणों ने उन्हें ऐसा करने से रोकने का प्रयास किया, लेकिन वह अपने निर्णय पर अडिग रहीं।

लोककथा के अनुसार, चंद्रावती देवी ने सोलह श्रृंगार किया। इसके बाद गांव की बहू-बेटियों को आशीर्वाद दिया और फिर पति की चिता के साथ सती हो गईं। मान्यता है कि इस घटना की स्मृति में बना समाधि स्थल धीरे-धीरे लोगों की आस्था का केंद्र बन गया। पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रचलित इस कथा ने ध्रुवगामा के सती स्थान को अलग धार्मिक पहचान दिलाई।

मां सती की समाधि है श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र
इस मंदिर की सबसे खास बात यहां की पूजा परंपरा है। दूसरे देवी मंदिरों की तरह यहां मां दुर्गा की प्रतिमा के दर्शन करने के बजाय मां सती की समाधि की पूजा की जाती है। श्रद्धालु समाधि स्थल पर पहुंचकर धूप-अगरबत्ती जलाते हैं, सिंदूर अर्पित करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

स्थानीय लोगों का विश्वास है कि मां सती के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मुराद पूरी होती है। इसी आस्था के साथ महिलाएं, पुरुष, बच्चे और बुजुर्ग यहां पहुंचते हैं। कोई परिवार की खुशहाली की कामना करता है, तो कोई संतान, स्वास्थ्य, सुख-शांति और समृद्धि के लिए आशीर्वाद मांगता है।

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समय के साथ इस स्थल की धार्मिक पहचान आसपास के गांवों से निकलकर दूसरे जिलों तक पहुंची है। पड़ोसी देश नेपाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं। लोगों के लिए यह स्थान केवल पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं, बल्कि पारिवारिक सुख-शांति और मनोकामना पूर्ति से जुड़ी आस्था का प्रतीक बन गया है।

पुत्र को वाणी मिलने की भी प्रचलित है लोककथा
मां सती स्थान से जुड़ी एक अन्य लोककथा गतिराम सिंह और चंद्रावती देवी के पुत्र बौद्ध राम सिंह से संबंधित है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, बौद्ध राम सिंह जन्म से ही बोल नहीं पाते थे। कहा जाता है कि चंद्रावती देवी के सती होने के बाद उनके पुत्र को वाणी प्राप्त हुई। श्रद्धालु इस घटना को मां सती की कृपा से जोड़कर देखते हैं।

स्थानीय लोगों के बीच पीढ़ियों से प्रचलित इस कथा ने भी सती स्थान के प्रति आस्था को मजबूत किया है। ध्रुवगामा में प्रचलित इन कथाओं के कारण मां सती स्थान की पहचान केवल एक समाधि स्थल तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा बन गया है। यहां लोग अपनी मान्यताओं के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं।

नवरात्र की सप्तमी से लगता है तीन दिवसीय मेला
सती स्थान पर वर्षभर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन शारदीय नवरात्र के दौरान यहां विशेष चहल-पहल रहती है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, नवरात्र की सप्तमी से तीन दिवसीय मेले का आयोजन किया जाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां सती की समाधि के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।

मेले के दौरान आसपास के क्षेत्रों में धार्मिक उत्साह का माहौल रहता है। श्रद्धालु समाधि स्थल पर पूजा करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं। कई श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी होने के बाद भी यहां पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं।

यह मेला धार्मिक आयोजन के साथ सामाजिक मेल-मिलाप का अवसर भी बनता है। आसपास के गांवों के लोग यहां जुटते हैं और नई पीढ़ी को सती स्थान से जुड़ी पुरानी लोककथाओं तथा परंपराओं के बारे में बताते हैं। इस तरह धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय सांस्कृतिक विरासत भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती है।

समाधि की पूजा की परंपरा ने दिलाई अलग पहचान
कल्याणपुर प्रखंड के ध्रुवगामा गांव स्थित सती स्थान अपनी अनूठी पूजा परंपरा के कारण अलग पहचान रखता है। समस्तीपुर जिला मुख्यालय से इसकी दूरी लगभग 18 से 20 किलोमीटर बताई जाती है। श्रद्धालु सड़क मार्ग से यहां पहुंचते हैं।

करीब छह सौ साल पुरानी मानी जाने वाली लोककथा, चंद्रावती देवी से जुड़ी मान्यताएं, पुत्र को वाणी मिलने का प्रसंग और समाधि की पूजा की परंपरा इस स्थल की धार्मिक महत्ता को बढ़ाते हैं। यही वजह है कि यहां स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ दूसरे जिलों और नेपाल से भी लोगों के पहुंचने का सिलसिला जारी रहता है।

ध्रुवगामा का सती स्थान समस्तीपुर की उन धार्मिक परंपराओं में शामिल है, जिनकी पहचान लोककथाओं और पीढ़ियों से चली आ रही आस्था से बनी है। यहां मां सती की समाधि की पूजा श्रद्धालुओं के लिए विश्वास, पारिवारिक मंगलकामना और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।

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