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Bihar News: डीएमसीएच में बदहाल सिस्टम: बच्चों का प्लास्टर खुद काट रहे परिजन, स्टाफ बना मूकदर्शक

Fri, 03 Apr 2026 09:42 AM IST
दरभंगा ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दरभंगा

सार

दरभंगा के DMCH अस्पताल में स्वास्थ्य व्यवस्था की बड़ी लापरवाही सामने आई है, जहां ऑर्थो विभाग में मरीजों के परिजनों से ही प्लास्टर कटवाया जा रहा है। छोटे-छोटे बच्चों तक के प्लास्टर ब्लेड से कटवाए जा रहे हैं, जो बेहद खतरनाक है।
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बच्चे का प्लास्टर काटते परिजन - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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उत्तर बिहार के सबसे बड़े अस्पताल, डीएमसीएच में गंभीर कुव्यवस्था सामने आई है। ऑर्थो विभाग में इलाज के दौरान मरीजों के परिजन खुद अपने बच्चों और मरीजों के हाथ-पैर के प्लास्टर काट रहे हैं। जबकि इसके लिए अस्पताल में स्टाफ और नर्स की नियुक्ति की गई है, लेकिन प्लास्टर काटने का काम मरीजों के परिजनों को थमा दिया गया है।
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मरीजों के परिजन कर रहे हैं प्लास्टर काटने का काम

गुरुवार दोपहर को जब मुस्कान कुमारी अपने गोद में मासूम को लेकर ऑर्थो विभाग पहुंची, तो वहां मौजूद स्टाफ ने उन्हें कहा कि “अपने हाथ से प्लास्टर काट लीजिए, फिर डॉक्टर देखेंगे।” यही उम्मीद लेकर वह खुद प्लास्टर काटने में लग गई। सिर्फ मुस्कान कुमारी ही नहीं, बल्कि आधा दर्जन से ज्यादा लोग अपने मरीजों के हाथ-पैर के प्लास्टर खुद काटते हुए देखे गए। खास बात यह है कि छोटे-छोटे बच्चों के प्लास्टर भी उनके पिता और परिजन ब्लेड से काट रहे थे।

खतरनाक है यह व्यवस्था

सोनू कुमार ने बताया कि ऑर्थो विभाग के बाहर ऐसी कई तस्वीरें देखने को मिलीं। जब परिजनों से पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि “मैडम ने खुद कहा था कि प्लास्टर काट लीजिए।” इससे साफ है कि अस्पताल स्टाफ अपनी जिम्मेदारी से बच रहे हैं। प्लास्टर काटना तकनीकी काम है। इसमें कोई गलती मरीज के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। ब्लेड के गलत इस्तेमाल से मरीज को दोबारा चोट लगने या संक्रमण फैलने का डर रहता है।
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अस्पताल प्रशासन की चुप्पी

इस मामले पर डीएमसीएच के अस्पताल अधीक्षक डॉ. जगदीशचंद्रा से बात करने की कोशिश की गई। उन्होंने मीडिया के सामने तस्वीर और वीडियो देख लिए, लेकिन प्रतिक्रिया देने से साफ इंकार कर दिया। उन्होंने पूरा मामला ऑर्थो विभागाध्यक्ष के पाले में डालते हुए कहा कि यह उनकी जिम्मेदारी है।

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सवाल खड़े करती है यह कुव्यवस्था

डीएमसीएच में ऐसी कुव्यवस्था मरीजों की सुरक्षा और अस्पताल की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करती है। स्टाफ और अधीक्षक की निष्क्रियता के कारण मरीजों और उनके परिजनों को जोखिम उठाना पड़ रहा है।
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