लालू प्रसाद यादव (फाइल फोटो)
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इस क्षेत्र के जिला शिक्षा पदाधिकारी डॉ. विमल ठाकुर ने ‘भाषा’ से कहा, ‘वर्तमान में जिला विद्यालयों की सूची में चरवाहा विद्यालय नाम का कोई स्कूल नहीं है।’ तुर्की के पुराने चरवाहा विद्यालय के पास ही उत्क्रमित मिडिल स्कूल खोला गया है जहां पहली कक्षा से आठवीं कक्षा के बच्चे पढ़ते हैं। लेकिन, इस स्कूल का चरवाहा विद्यालय से कोई लेना देना नहीं है। स्कूल की प्राचार्या नीलम कुमारी ने बताया कि यहां से कुछ दूरी पर चरवाहा विद्यालय था और अब कृषि विभाग के कुछ कर्मचारी वहां आते जाते रहते हैं।
तुर्की में खंडहर हो चुके चरवाहा विद्यालय के कुछ ही कदमों की दूरी पर कृषि विभाग के कुछ कमरे बने हैं जहां विभाग के कुछ कर्मचारी रहते है। इनमें कृषि विभाग की जमीन को जोतने वाले हलधर कर्मी भी शामिल हैं। बिहार कृषि विभाग के हलधर गोपाल पासवान ने बताया कि कई सालों से यह चरवाहा विद्यालय ऐसी ही हालत में है। उन्होंने बताया कि वह कृषि विभाग की जमीन पर फसल उगाते हैं।
गरीबों के बच्चों को शिक्षित करने की पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की यह पहल न सिर्फ बिहार बल्कि देश-दुनिया में चर्चित हुई थी। तब उन्होंने नारा दिया था, 'ओ गाय चराने वालों, भैंस चराने वालों... पढ़ना-लिखना सीखो।' तुर्की के ही एक ग्रामीण रामश्रेष्ठ साव बताते हैं कि चरवाहा विद्यालय शुरूआती एक-दो साल तो खूब चला लेकिन कुछ ही वर्षों में पहले शिक्षकों ने आना बंद कर दिया और उसके बाद बच्चों ने।
चरवाहा विद्यालय (फाइल फोटो)
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गौरतलब है कि 23 दिसंबर 1991 को मुजफ्फरपुर के तुर्की में 25 एकड़ जमीन में पहला चरवाहा विद्यालय खुला था। स्कूल का उद्घाटन औपचारिक तौर पर 15 जनवरी 1992 को किया गया था। अमेरिका और जापान से कई टीमें इस विद्यालय को देखने आई थीं। विद्यालय में पांच शिक्षक, नेहरू युवा केंद्र के पांच स्वयंसेवी और इतने ही एजुकेशन इंस्ट्रक्टर की तैनाती की गई थी।
इस चरवाहा स्कूल को चलाने की जिम्मेदारी कृषि, सिंचाई, उद्योग, पशु पालन, ग्रामीण विकास और शिक्षा विभाग को दी गई थी। इसमें पढ़ने वाले बच्चों को मध्याह्न भोजन, दो पोशाकें, किताबें और मासिक छात्रवृत्ति के तौर पर नौ रुपये मिलते थे। जानकार बताते हैं कि इतने विभागों में समन्वय बैठाना मुश्किल था, जो संभवत: इस विद्यालय के पराभव का प्रमुख कारण रहा।
शिक्षाविद् जीयन राय का कहना है कि चरवाहा विद्यालय के विचार में श्रम की प्रतिष्ठा थी, वैज्ञानिकता थी और रोजगार से शिक्षा की तरफ जाने की सोच थी लेकिन विभिन्न राजनीतिक और खासतौर पर प्रशासनिक कारणों से ये ठंडे बस्ते में चला गया।