दिवंगत रामविलास पासवान का यह मंत्री आवास खाली करना पड़ गया था सांसद चिराग पासवान को।
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पासवान के मैनेजर ने एनडीए को कर लिया मैनेज
नीतीश के नाम पर चिराग से भाजपा ने जो दूरी बनाई, उसका फायदा दिवंगत रामविलास पासवान के मंझले भाई पशुपति कुमार पारस को मिला। रामविलास अपने भाई पारस को 'मैनेजर’ कहा करते थे और उन्होंने एनडीए को मैनेज करते हुए अपने बड़े भाई की जगह केंद्रीय मंत्री की कुर्सी हासिल भी कर ली। लोजपा के छह में से चिराग को छोड़कर बाकी सभी पारस के साथ थे, इस आधार पर भाजपा ने मंत्रिमंडल में दिवंगत रामविलास पासवान के भाई को एंट्री दी। चिराग न केवल यहां से बाहर हुए, बल्कि रामविलास पासवान के दिल्ली आवास से भी।
अब क्यों जरूरी हो गए चिराग, उसका गणित देखें
चाचा के मंत्री होने के बावजूद चिराग पासवान ने हिम्मत नहीं हारी। बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर संयमित तरीके से जुबानी हमला करने में चिराग आगे हैं, बेशक। इसके अलावा चिराग के पास पारस के मुकाबले युवाओं की फैन फॉलोइंग ज्यादा है, यह सभी मानते हैं। बिहार के युवा उन्हें सीएम बनाने की भी मांग करते रहे हैं। इन बातों से अलग, गणित देखें तो 2020 के विधानसभा चुनाव में लोजपा को बिहार के कुल वैध वोटों का 5.66 प्रतिशत हिस्सा हासिल हुआ था। जितनी सीटों पर लोजपा ने प्रत्याशी दिए थे, वहां कुल वैध वोटों का 10.26 प्रतिशत हिस्सा हासिल हुआ था। जदयू के समर्थन सहित भाजपा को बिहार के कुल वैध वोटों का 19.46 प्रतिशत मिला था। भाजपा के समर्थन सहित जदयू को बिहार के कुल वैध वोटों का 15.39 प्रतिशत वोट मिला था। इस गणित में लोजपा का प्रभाव साफ झलकता है। हां, यह लोजपा संयुक्त है। इसे अब वापस एक साथ लाना भाजपा के लिए जरूरी है। वह हो गया तो पासवान के खाते का पूरा वोट प्रतिशत फिर भाजपा के पास होगा, जो जरूरी है। 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए ही नहीं, 2025 के विधानसभा चुनाव के लिए भी।