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बिहार: RTI कार्यकर्ताओं की जान को ख़तरा

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बिहार के अररिया ज़िला निवासी अनुराग प्रशांत ने आमिर खान के लोकप्रिय सीरियल 'सत्यमेव जयते' से प्रेरित होकर सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून का प्रयोग भ्रष्टाचार उजागर करने के लिए तो किया, लेकिन उनका जुनून जल्द ही ठंडा पड़ गया।
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दरअसल, अनुराग ने अप्रैल, 2014 में 'डिस्ट्रिक्ट अर्बन एरिया डेवलपमेंट एजेंसी', अररिया के कार्यालय से सड़क निर्माण से जुड़ी जानकारी हासिल करने को आवेदन दिया था। उन्नीस साल के अनुराग बताते हैं कि सूचना मांगने के महज कुछ दिनों के बाद से ही उनके मोबाइल पर अवांछित कॉल आने लगे। रात-दिन समझाने के लहजे में धमकी दी जाने लगी। जबरन आवेदन वापस लिए जाने को कहा जाता रहा।

कुछ दिनों बाद जाने-अनजाने चेहरे उनकी कोचिंग और घर के बाहर जुटने लगे। वो लोग शोर मचाते। घर में तनाव की स्थिति बन गई थी। प्रताड़ना की शुरुआत धमकी से शुरू हो चुकी थी। सूचना और उससे जुड़े गठजोड़ के बीच की रस्साकशी ने 'सत्यमेव जयते' सीरियल से उपजा जज्बा समाप्त कर दिया। आवेदक अनुराग ने डरकर सूचना की दुनिया से अपने कदम पीछे खींच लिए।
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सूचना की कीमत बनी जिंदगी

मुजफ्फरपुर ज़िला के रत्नौली पंचायत के सामाजिक कार्यकर्ता और पेशे से वकील रहे रामकुमार ठाकुर आरटीआई के माध्यम से मनरेगा में घपले की सच्चाई सतह पर लाना चाहते थे। मार्च, 2013 में उनकी हत्या कर दी गई। समूचे प्रकरण की जांच जिला पुलिस से सीआईडी तक पहुँचने में करीब साल भर लग गए। अभियुक्त अब तक पकड़े नहीं गए हैं।

मुंगेर ज़िला के मुरलीधर जायसवाल ने भी जब पंचायत मुखिया के कार्यकाल की विकास योजनाओं की सूचना मांगी तो अप्रैल, 2012 में उनकी हत्या कर दी गई। इतना ही नहीं, इस साल मार्च में मुरलीधर हत्याकांड के सूचना देने वाले उनके भतीजे पर जानलेवा हमला हुआ, लेकिन वह बच गए। महीने भर बाद दुस्साहसी हमलावरों ने मुरलीधर के रिश्तेदार प्रेमचंद जायसवाल की भी हत्या कर दी।

दरअसल, भ्रष्टाचार पर चोट करने के लिए आरटीआई कानून 2005 में लागू होते ही सूचना मांगने और इसे दबाए रखने वालों के बीच एक पाला खिंच गया और सूचना कार्यकर्ताओं की हत्याएं शुरू हो गईं।

तीन साल में छह कार्यकर्ताओं की हत्या

सूचना मांगने की वजह से साल 2010 से 2013 के बीच राज्य में छह लोगों की हत्या कर दी गई। इस मामले में बिहार और गुजरात का स्थान देश में दूसरा है। इस सूची में अव्वल महाराष्ट्र है, जहाँ नौ कार्यकर्ताओं की हत्या की जा चुकी है। वहीं, बिहार राज्य सूचना आयोग के मुताबिक मार्च, 2012 से फरवरी, 2014 तक यहाँ 392 आवेदकों को उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा है।

साल 2006 से 2010 के बीच उत्पीड़न के 54 मामले बिहार राज्य मानवाधिकार आयोग में दर्ज हुए। आयोग ने कार्रवाई की अनुशंसा तो की लेकिन, आज तक कुछ हुआ नहीं। कुछ लोग धमकी और ख़तरे की वजह से सूचना मांगने का संघर्ष बीच में ही छोड़ देते हैं और जो आगे बढ़ते हैं उनमें से कई अपनी जान तक गवां बैठे। सरकारी तंत्र सूचना कार्यकर्ताओं की सुरक्षा पर ठंडा रवैया अपनाता है। सब कुछ कागजों तक ही सिमटा रहता है।

बिहार राज्य सूचना आयोग के सचिव डीपी चौधरी का कहना है, "सामाजिक कार्यकर्ताओं को सुरक्षा मुहैया कराना आयोग के कार्यक्षेत्र में नहीं आता। बावजूद इसके आयोग कार्यकर्ताओं का सहयोग करता है और शिकायत से संबंधित निवेदन आगे की कारवाई के लिए संबंधित पदाधिकारी को भेज दिया जाता है।"
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डर के आगे मिली जीत

तमाम जोखिम के बावजूद जो कार्यकर्ता सक्रिय रहे उनकी जीत हुई। ऐसे सूचना कार्यकर्ताओं की वजह से कई सकारात्मक परिवर्तन हुए। बिहार सरकार को मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी योजना) श्रमिकों के मानदेय को 138 रुपए से बढ़ा कर 144 रुपए करना पड़ा और राज्य स्तरीय नई जल-भूगर्भ नीति बनाने को भी बाध्य होना पड़ा।

इसके साथ ही प्रदेश की पंचायतों में दस हज़ार करोड़ रुपए का सोलर लाइट घोटाला, 2500 करोड़ का चावल घोटाला और फर्जी शिक्षक नियुक्ति घोटाले के आरोप लगते रहे हैं। इन गड़बड़ियों की जांच विभिन्न स्तरों पर जारी है। सूचना के जन-अधिकार का राष्ट्रीय अभियान (एनसीपीआरआई) वर्किंग कमिटी के सदस्य आशीष रंजन कहते हैं कि राज्य में सामाजिक कार्यकर्ताओं पर आए दिन हो रहे हमले के ख़िलाफ़ सशक्त आंदोलन खड़ा करने का प्रयास जारी है।

आशीष का मानना है कि कानून के प्रति जागरूकता बढ़ी है। लगभग एक लाख आवेदन हर साल डाले जा रहे हैं। अगर हर आवेदक को एक एक्टिविस्ट मानें तो इनकी वास्तविक संख्या का अनुमान लगाया जा सकता है। आरटीआई से जुड़ी चुनौतियों की ओर इशारा करते हुए आशीष कहते हैं, "पंचायत स्तर पर स्थिति काम्प्लेक्स होती है। सूचना की लड़ाई, व्यक्तिगत लड़ाई की शक्ल ले लेती है। नतीजा हत्या व उत्पीड़न के आंकड़े बयां कर रहे हैं।"

बावजूद इसके आरटीआई भ्रष्टाचार के खिलाफ आज एक मजबूत हथियार बन कर उभरा है। अगर भारतीय जनता पार्टी की सरकार शिकायतकर्ता सुरक्षा कानून (व्हीसल ब्लोअर एक्ट) को अमलीजामा पहना देती है तो, शायद अच्छे दिन आ जाएँ।
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