दरभंगा मखाना अनुसंधान केंद्र को मिला राष्ट्रीय दर्जा
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बिहार में दरभंगा मखाना अनुसंधान केंद्र का कार्यक्षेत्र सिर्फ पूर्वी भारत में न सिमटकर पूरे राष्ट्रीय स्तर तक हो गया है। राष्ट्रीय दर्जा हासिल होने से मिथिला की सांस्कृतिक पहचान की प्रतीक मछली और मखाना को राष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर से पहचान मिल गई है। अब मखाना के साथ-साथ मछली और अन्य जलीय फसलों की नई प्रजाति विकसित करने और इसकी उत्पादकता बढ़ाने के लिए नए शोध कार्य होने के रास्ते खुल गए हैं। इससे मिथिला के औद्योगिक विकास को एक नई दिशा मिलना अब आसान हो जाएगा। जिला वासियों ने दरभंगा मखाना अनुसंधान केंद्र को दोबारा राष्ट्रीय दर्जा प्रदान करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के प्रति भी आभार जताया है।
‘बुनियादी रणनीति तय होने और कारगर अनुसंधान के रास्ते खुले’
मैथिली अकादमी के पूर्व अध्यक्ष कमलाकांत झा ने कहा कि दरभंगा के मखाना अनुसंधान केंद्र को राष्ट्रीय दर्जा मिलने से अब यहां कृषि वैज्ञानिकों की सुविधाओं में वृद्धि होगी। साथ ही, यहां मौजूद आधारभूत संरचनाओं का विकास होना निश्चित है। इससे जलीय फसल की उत्पादन क्षमता विकसित होने के साथ-साथ खाद्य प्रसंस्करण प्रौद्योगिकी के मानकीकरण के लिए बुनियादी रणनीति तय होने और कारगर अनुसंधान के रास्ते खुल गए हैं।
'राष्ट्रीय दर्जा मिलने से फिर से विकास में गति आएगी'
मखाना अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. अनिल कुमार झा ने बताया कि मखाना अनुसंधान केंद्र से राष्ट्रीय दर्जा छिन जाने के बाद, अनुसंधान की गतिविधि धीमी हो गई थी। बावजूद इसके इस केंद्र के वैज्ञानिकों ने मखाना की न सिर्फ पहली प्रजाति स्वर्ण वैदेही को विकसित किया। बल्कि ‘एक जिला, एक उत्पाद’ योजना के तहत दरभंगा का चयन मखाना के विकास के लिए किया गया। अब दोबारा इसे राष्ट्रीय दर्जा मिलने से फिर से विकास में गति आएगी।
‘विकास के नए अवसर आसानी से उपलब्ध हो सकेंगे’
वरिष्ठ साहित्यकार मणिकांत झा ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी को मिथिला क्षेत्र के विकास की बहुत फिक्र थी। इसलिए, उन्होंने दरभंगा में राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र की स्थापना की थी। लेकिन, लंबे समय तक इसे गंदी राजनीति का शिकार बनाकर राष्ट्रीय दर्जा से वंचित कर दिया गया। अब फिर से राष्ट्रीय दर्जा मिलने से मिथिला में विकास के नए अवसर आसानी से उपलब्ध हो सकेंगे।