लोक गायिका शारदा सिन्हा के साथ अपने अनुभवों को अंजिता सिन्हा ने 'अमर उजाला' के लिए शेयर किया।
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पति को सारा श्रेय देती रही हैं शारदा सिन्हा, ससुराल का वाकया भी अहम
इन दिनों एम्स में भर्ती हैं, लेकिन इससे पहले पटना में मेरा उनसे अक्सर मिलना होता था। चाहे जितनी बार बात हुई, वह अपनी संगीत यात्रा की लयबद्ध रवानी के लिए पति को सारा श्रेय देती रहीं। वैसे, मैं गवाह भी हूं कि लोकगीतों की परंपरा को पिछले पांच दशक से नित नए आयाम देतीं शारदा सिन्हा को अपार लोकप्रियता यूं ही नहीं मिली। इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्होंने संघर्षों का लंबा रास्ता तय किया है। शारदा सिन्हा ने चार-पांच वर्ष की अवस्था से ही गाना शुरू कर दिया था। उनके पिता सुखदेव ठाकुर ने शारदा जी के गायन कला को विस्तृत फलक पर लाने के लिए प्रेरित किया। इस तरह शारदा की प्रारंभिक और विधिवत शिक्षा पंडित रघु झा, पंडित सीताराम हरि दांडेकर और पन्ना देवी के सानिध्य में शुरू हुई। उन्होंने भारतीय नृत्य कला मंदिर पटना से मणिपुरी नृत्य में नृत्य विशारद की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया।
कला साधना में रत शारदा सिन्हा का विवाह 1971 में समस्तीपुर के एक कॉलेज के व्याख्याता ब्रजकिशोर सिन्हा से हुआ। संगीत की प्रवीण शारदा सिन्हा ने स्टेज पर गाते रहने की ख्वाहिश जाहिर की तो मैथिली भाषा मे उनकी सास ने अपना हुक्मनामा सुनाया और कहा कि 'घर आंगन में दाई-माई जकाँ जेबाक अछि त गाऊं, बाहर में स्टेज पर नहिं जाए देब'। स्टेज पर गाने से स्पष्ट रोक के सास के इस आदेश ने शारदा जी को मायूस कर दिया और अपना ख्वाब धुंधला होता नजर आया। तभी उनके पति ने आगे बढ़कर उनके ख्वाबों को हसीन रंगों से भर देने के अंदाज़ में कहा- "आप ज़रूर गाइएगा।" इसे याद करते हुए शारदा सिन्हा ने अपने दिवंगत हो गए जीवनसाथी के श्राद्ध के दिन उनकी तस्वीर पर माल्यार्पण करते हुए भावुक स्वरों में अपनी स्वरांजलि देते हुए रुंधे गले से पति के पसंदीदा गीतों में शामिल गाना गाया- "लाल सिंदूर बिन मंगियो ना सोभे, सइयाँ रे बिन सेजिया न सोभे राजा।"
भोजपुरी, बज्जिका, मगही और मैथिली भाषा में गाए गीत
शारदा जी ने बिहार गौरव, भोजपुरी कोकिला, बिहार रत्न, भिखारी ठाकुर सम्मान, मिथिला विभूति सहित कई अन्य सम्मानों के साथ पद्मश्री और पद्मभूषण जैसे सम्मान प्राप्त किए। समस्तीपुर महिला कॉलेज में संगीत विभाग की विभागाध्यक्ष के पद से अवकाश प्राप्त कर चुकीं शारदा सिन्हा ने अब तक भोजपुरी, बज्जिका, मगही और मैथिली भाषा में विवाह औऱ छठ के सैकड़ों पारम्परिक गीत गाये हैं। इतनी व्यस्तता के बावजूद उन्होंने घर-परिवार, पति, बच्चे और प्रोफेशन के बीच संतुलन बनाए रखा। यह सब आसान नहीं था, लेकिन पति और दोनों बच्चों बेटी वंदना और पुत्र अंशुमान के सहयोग ने हर मुश्किलों के दरम्यान एक मुकम्मल रास्ता बना लेंने का उन्हें जज़्बा दिया।
पति के कारण पान चखा तो शौकीन हो गई, डॉक्टरी सलाह पर छोड़ा
पान, दही, करेले का भरवां, पनीर और हरी मिर्च का भरवां खाने की शौकीन शारदा जी ने पिछले कुछ वर्षों से डॉक्टरों की सलाह पर पान खाना छोड़ दिया है। इस क्रम में वे एक वाकया सुनाती हैं। शादी के शुरुआती दिनों में वे अपने पति के पान खाने की आदत से परेशान थीं और इस बात पर अक्सर अपने पति से उनका झगड़ा होता। फिर एक दिन उनके पति ने शारदा जी को मीठा पान खिलाया। पान में डाली गई खुशबू उन्हें भा गई और फिर ज़रदे की खुशबू भी भाने लगी तो पान खाना उनकी भी आदतों में शुमार हो गया। लेकिन, अब डॉक्टरी सलाह पर पान छोड़ चुकी हैं। बहरहाल, शारदा सिन्हा की लंबे और स्वस्थ जीवन की शुभकामनाएं उनके प्रशंसक उन तक विभिन्न माध्यमों से पहुंचा रहे हैं- ए छठी मईया सुन लीं अरजिया हमार...।