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Bihar News : क्या करने वाले हैं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार? बेटे निशांत को लेकर खूब मचा है हंगामा

सार

Nitish Kumar : बिहार के मुख्यमंत्री की छवि बिगाड़ने पर मुकदमा हो रहा है। फिर भी, मीडिया के एक बड़े हिस्से में कभी उनके पाला बदलने तो कभी बेटे को राजनीति में उतारने की बात हो रही है। क्या सीएम नीतीश कुमार अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारेंगे?
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परिवारवाद पर हमला करते रहे नीतीश कुमार क्या बेटे को राजनीति में लाने वाले हैं? यह सवाल आज हर तरफ है। - फोटो : अमर उजाला डिजिटल
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विस्तार
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1. "डॉक्टर का बेटा डॉक्टर, वकील का बेटा वकील... तो राजनीतिज्ञ का बेटा राजनीति में क्यों नहीं?"
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2. "निशांत की राजनीति में एंट्री कोई पॉलिटिकल निर्णय नहीं है, यह उनके पिता नीतीश कुमार तय करेंगे।"
3. "राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने बेटे को गद्दी दें, यह गलत है।"
4. "मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मानसिक स्थिति ठीक नहीं, निशांत कुमार का राजनीति में स्वागत है।"


- यह चार बयान हैं और चारों अलग-अलग तरह से। पहला बयान जन सुराज के दिग्गज नेता का है, जो परिवार में से किसी एक के राजनीति में आने को परिवारवाद नहीं कह रहे। दूसरा बयान बिहार में सत्तारूढ़ दल के मंत्री का है, जो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की इच्छा को लेकर संशय में हैं। तीसरा बयान माहौल में है, जो निश्चित तौर पर बनाया हुआ दिख रहा है। चौथा बयान विपक्ष के नेता का है, जो खुद परिवारवाद के सबसे बड़े चेहरे लालू प्रसाद यादव के बेटे हैं। 

पहले बयानों की चर्चा इसलिए, क्योंकि जमीन पर ऐसा कुछ नहीं है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की छवि बिगाड़ने पर बाकायदा मुकदमा हो रहा है। इसके बावजूद सोशल मीडिया की अफवाहों पर केंद्रित होकर मीडिया का एक हिस्सा यह भी बता रहा है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भारतीय जनता पार्टी से अपनी पार्टी जनता दल यूनाईटेड को बचाने के लिए अपने बेटे को राजनीति में उतारने की तैयारी की है। सच आखिर क्या है? क्या होने वाला है? कुछ होने वाला भी है या नहीं? इन सवालों के साथ जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को 30 वर्षों से अधिक समय से जानने वाले पांच पत्रकारों से बात की गई तो कारण सहित जवाब मिला। जिनसे बात की गई, वह किसी एक धरे में नहीं रहते हैं, इसलिए नाम नहीं छापने की शर्त पहले रख दी।

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क्या नीतीश कुमार आगे पाला बदल सकते हैं?
जवाब- पहले भी पाला नहीं बदला, परिस्थितियां बदल गईं। एनडीए एक तरह से स्थायी और स्वाभाविक घर है। पहली बार मनमुटाव के नाम पर निकले तो जहां गए- वहां खुद को सहज नहीं पा सके। भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति के कारण लौटे। दूसरी बार भी घर में मनमुटाव पर ही निकले और वहां जब संभावना नहीं नजर आई तो लौट गए। अब मनमुटाव की आशंका इसलिए कम हो गई है, क्योंकि सीएम नीतीश कुमार ने महात्वाकांक्षा का त्याग कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष सहज हो गए हैं। भाजपा को बड़ा भाई मानने में गुरेज नहीं करते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इसी महीने बिहार दौरे से पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दिल्ली जा रहे हैं। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को लेकर वहां एनडीए नेताओं से बातचीत की जमीन तैयार की जा रही है।

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चुनाव के पहले बजट, उससे पहले सीएम नीतीश कुमार बिहार में प्रगति यात्रा पर हैं। - फोटो : अमर उजाला डिजिटल
क्या भाजपा से पार्टी पर खतरा देख निर्णय लेंगे?
जवाब- पिछले साल जनवरी-फरवरी के बीच राजनीतिक उठापटक में सामने आ गया कि जनता दल यूनाईटेड के अंदर तोड़फोड़ की कोशिश कौन कर रहा था, इसलिए वह इसपर बहुत गंभीरता से ध्यान नहीं दे रहे हैं। भाजपा के सबसे करीब रहने वाले अपने करीबी संजय झा को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बना रखा है। मुख्यमंत्री राजनीति में यह जानते हैं कि जो कमजोर होता है, उसे टूट का सामना करना पड़ता है। इसलिए, अपनी पार्टी को कमजोर नहीं होने देने पर फोकस कर रहे हैं। उन्हें पता है कि भाजपा भी जदयू को तोड़ सकती है, इसलिए वह अपनी छवि की बदौलत राजनीति में टिके रहना चाहते हैं। 

और, अब असल सवाल
क्या नीतीश कुमार अपने बेटे निशांत को राजनीति में लाएंगे?
जवाब- यह सवाल तो सोशल मीडिया पर उठा है, वहीं तक रहना चाहिए था। स्वस्थ पत्रकारिता में यह सवाल इसलिए नहीं आना चाहिए, क्योंकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शुरू से परिवारवाद के खिलाफ रहे हैं। परिवार के लोगों को बढ़ावा देने के कारण लालू प्रसाद यादव को भी टारगेट करते रहे हैं। नीतीश कुमार पर जो किताब है, उसमें भी शुरू से कई मौके दिखाए गए हैं कि वह अपने परिवारजनों को अलग रखते हैं। उनके भाई या बहन और यहां तक के बेटे की जानकारी भी तभी सामने आयी है, जब साथ में दिखे हों। मंच पर भी नहीं लेकर कभी गए। जातीय जनगणना की शुरुआत के समय अपने मूल घर पर गए, तक बेटे निशांत के साथ दिखे। अपनी मां या पिताजी या पत्नी के श्राद्ध, पुण्यतिथि या जयंती पर ही बेटे को साथ रखते हैं। अभी भी सिर्फ एक बार नीतीश कुमार के बेटे निशांत ने ऐसे ही एक कार्यक्रम में एक लाइन बोल दिया कि उनके पिता राज्य की सेवा कर रहे हैं और इस बार भी जनता मौका दे। इससे ज्यादा कोई बात जमीन पर नहीं। अगर सीधे शब्दों में कहें तो अपने जीते जी शायद ही नीतीश कुमार बेटे को राजनीति में लाएंगे। अगर वह परिवारवाद के खिलाफ चलने के अपने सिद्धांत से समझौता करेंगे तो शायद ही फिर जनता के सामने जाएंगे।

तो, क्यों चल रही इतनी बातें- यह भी समझें
तीन सवालों पर पांच पुराने पत्रकारों से बात करने पर जो बातें निकलीं, उसपर चाणक्य स्कूल ऑफ पॉलिटिकल राइट्स एंड रिसर्च के अध्यक्ष और रिसर्च जर्नलिस्ट सुनील कुमार सिन्हा से राय ली गई तो उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार की छवि को लेकर संशय बनाए रखने के लिए उनके विरोधी यह साजिश कर रहे हैं- ऐसा साफ लगता है। उन्होंने कहा- "जब निशांत ने कभी राजनीति के किसी मंच, यहां तक कि समाजसेवा की पहली सीढ़ी पर ही पैर नहीं रखा तो उसे राजनीति में घसीट कौन रहा है? बिहार की राजनीति में परिवारवाद के कई चेहरे हैं और उनमें लालू प्रसाद यादव के अलावा दिवंगत रामविलास पासवान के साथ अब प्रमुख चेहरों में जीतन राम मांझी का भी नाम आता है। दूसरी तरफ नीतीश कुमार ने परिवारवाद के खिलाफ ही राजनीतिक कद हासिल किया है, इसलिए वह तो कभी निशांत को आगे करेंगे नहीं। विपक्ष ही निशांत का स्वागत कर रहा है और वही उसे हरनौत से खड़ा भी कर रहा है। जो नीतीश के खिलाफ हैं, वही परिवारवाद की नई परिभाषा में एक बेटे को राजनीति में लाने का रास्ता निकाल रहे हैं ताकि मुख्यमंत्री पर हमला करना आसान हो। दूसरी तरफ सत्ताधारी दलों भाजपा-जदयू के साथ ही एनडीए के केंद्रीय मंत्रियों चिराग पासवान और जीतन राम मांझी ने तो नीतीश कुमार के निर्णय पर सब छोड़ रखा है, क्योंकि मुख्यमंत्री का फैसला सभी को पता है।"
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