चुनाव के पहले बजट, उससे पहले सीएम नीतीश कुमार बिहार में प्रगति यात्रा पर हैं।
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क्या भाजपा से पार्टी पर खतरा देख निर्णय लेंगे?
जवाब- पिछले साल जनवरी-फरवरी के बीच राजनीतिक उठापटक में सामने आ गया कि जनता दल यूनाईटेड के अंदर तोड़फोड़ की कोशिश कौन कर रहा था, इसलिए वह इसपर बहुत गंभीरता से ध्यान नहीं दे रहे हैं। भाजपा के सबसे करीब रहने वाले अपने करीबी संजय झा को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बना रखा है। मुख्यमंत्री राजनीति में यह जानते हैं कि जो कमजोर होता है, उसे टूट का सामना करना पड़ता है। इसलिए, अपनी पार्टी को कमजोर नहीं होने देने पर फोकस कर रहे हैं। उन्हें पता है कि भाजपा भी जदयू को तोड़ सकती है, इसलिए वह अपनी छवि की बदौलत राजनीति में टिके रहना चाहते हैं।
और, अब असल सवाल
क्या नीतीश कुमार अपने बेटे निशांत को राजनीति में लाएंगे?
जवाब- यह सवाल तो सोशल मीडिया पर उठा है, वहीं तक रहना चाहिए था। स्वस्थ पत्रकारिता में यह सवाल इसलिए नहीं आना चाहिए, क्योंकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शुरू से परिवारवाद के खिलाफ रहे हैं। परिवार के लोगों को बढ़ावा देने के कारण लालू प्रसाद यादव को भी टारगेट करते रहे हैं। नीतीश कुमार पर जो किताब है, उसमें भी शुरू से कई मौके दिखाए गए हैं कि वह अपने परिवारजनों को अलग रखते हैं। उनके भाई या बहन और यहां तक के बेटे की जानकारी भी तभी सामने आयी है, जब साथ में दिखे हों। मंच पर भी नहीं लेकर कभी गए। जातीय जनगणना की शुरुआत के समय अपने मूल घर पर गए, तक बेटे निशांत के साथ दिखे। अपनी मां या पिताजी या पत्नी के श्राद्ध, पुण्यतिथि या जयंती पर ही बेटे को साथ रखते हैं। अभी भी सिर्फ एक बार नीतीश कुमार के बेटे निशांत ने ऐसे ही एक कार्यक्रम में एक लाइन बोल दिया कि उनके पिता राज्य की सेवा कर रहे हैं और इस बार भी जनता मौका दे। इससे ज्यादा कोई बात जमीन पर नहीं। अगर सीधे शब्दों में कहें तो अपने जीते जी शायद ही नीतीश कुमार बेटे को राजनीति में लाएंगे। अगर वह परिवारवाद के खिलाफ चलने के अपने सिद्धांत से समझौता करेंगे तो शायद ही फिर जनता के सामने जाएंगे।
तो, क्यों चल रही इतनी बातें- यह भी समझें
तीन सवालों पर पांच पुराने पत्रकारों से बात करने पर जो बातें निकलीं, उसपर चाणक्य स्कूल ऑफ पॉलिटिकल राइट्स एंड रिसर्च के अध्यक्ष और रिसर्च जर्नलिस्ट सुनील कुमार सिन्हा से राय ली गई तो उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार की छवि को लेकर संशय बनाए रखने के लिए उनके विरोधी यह साजिश कर रहे हैं- ऐसा साफ लगता है। उन्होंने कहा- "जब निशांत ने कभी राजनीति के किसी मंच, यहां तक कि समाजसेवा की पहली सीढ़ी पर ही पैर नहीं रखा तो उसे राजनीति में घसीट कौन रहा है? बिहार की राजनीति में परिवारवाद के कई चेहरे हैं और उनमें लालू प्रसाद यादव के अलावा दिवंगत रामविलास पासवान के साथ अब प्रमुख चेहरों में जीतन राम मांझी का भी नाम आता है। दूसरी तरफ नीतीश कुमार ने परिवारवाद के खिलाफ ही राजनीतिक कद हासिल किया है, इसलिए वह तो कभी निशांत को आगे करेंगे नहीं। विपक्ष ही निशांत का स्वागत कर रहा है और वही उसे हरनौत से खड़ा भी कर रहा है। जो नीतीश के खिलाफ हैं, वही परिवारवाद की नई परिभाषा में एक बेटे को राजनीति में लाने का रास्ता निकाल रहे हैं ताकि मुख्यमंत्री पर हमला करना आसान हो। दूसरी तरफ सत्ताधारी दलों भाजपा-जदयू के साथ ही एनडीए के केंद्रीय मंत्रियों चिराग पासवान और जीतन राम मांझी ने तो नीतीश कुमार के निर्णय पर सब छोड़ रखा है, क्योंकि मुख्यमंत्री का फैसला सभी को पता है।"