पिछले दो दशक में सुशील मोदी को बिहार भाजपा में पहली बार शिकस्त मिलती हुई दिख रही है। सुशील मोदी को राज्यसभा का उम्मीदवार नहीं बनाना उनके लिए उतना बड़ा झटका नहीं है, जितना बड़ा झटका गोपाल नारायण सिंह जैसे उनके कट्टर विरोधी को राज्यसभा का टिकट मिलना है। यह बिहार भाजपा में बड़े फेरबदल के संकेत हैं। केंद्रीय नेतृत्व ने पहले प्रेम कुमार और अब गोपाल नारायण सिंह को वजन देकर सुशील मोदी एंड टीम को सकते में डाल दिया है।
गौरतलब है कि गोपाल नारायण सिंह को टिकट मिलने के बाद सुशील मोदी खामोश हैं, वहीं गोपाल बाबू के तेवर और सख्त हो गये हैं। पहले उन्होंने सुशील का नाम लिये बगैर कहा कि एक बड़े नेता ने पिछली बार उनका टिकट कटवा दिया, नहीं तो वो उसी समय दिल्ली जाने वाले थे। सोमवार को मोदी का नाम लेते हुए उन्होंने साफ तौर पर कहा कि वो सुशील मोदी से पुराने और बड़े नेता हैं।
पार्टी ने उन्हें चुनाव मैदान में इसलिए उतारा था, क्योंकि वो नेतृत्व के चेहरों में से एक थे। मोदी के करीबी एक नेता का कहना है कि सुशील मोदी ने राज्यसभा जाने की तो सहमति दी थी, पर वह केंद्रीय मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री के रूप में जगह चाहते थे। शायद केंद्रीय नेतृत्व को मोदी की यह शर्त मंजूर नहीं थी। जिस वजह से मोदी को टिकट नहीं दिया जा सका।