लोकसभा चुनाव 2024 के एग्जिट पोल ने एक बार फिर 2019 के ऐसे सर्वे के आंकड़ों को लगभग दोहरा दिया है। पिछली बार सिर्फ एक एग्जिट पोल ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को 38 से 40 सीटें दी थीं। बाकी ने राजग को 30 से 34 सीटों के आसपास रखा था। इस बार पिछली बार के मुकाबले राजग की स्थिति एग्जिट पोल में खराब दिख रही है। राजग को न्यूनतम 27 और अधिकतम 36 सीटें दी जा रही हैं। दो एग्जिट पोल अन्य (निर्दलीय) के खाते में एक सीट दे रहे हैं। लेकिन, सबसे बड़ी बात यह कि महागठबंधन को बिहार में दो से लेकर 10 सीटें दी जा रही हैं। मतलब, यह परिणाम में बदला तो महागठबंधन के खाते में उपलब्धि तो आएगी ही। और यह उपलब्धि राष्ट्रीय स्तर पर बने इंडी एलायंस की नहीं, बल्कि बिहार में पहले से चल रहे महागठबंधन की होगी। उससे भी ज्यादा इकलौते विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव की।
सीट बांटे बगैर प्रत्याशी उतारने के साथ दिखा दी ताकत
एग्जिट पोल को तेजस्वी यादव फिलहाल गलत मान रहे हैं। उनका कहना है कि परिणाम वही होगा, जो इंडी एलायंस की दिल्ली में हुई बैठक के बाद बताया गया। उस हिसाब से बिहार की 40 सीटों पर भी उन्हें करिश्मे का इंतजार है। वैसे, राज्य विधानसभा की सबसे बड़ी पार्टी लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल के पास अभी एक भी लोकसभा सांसद नहीं हैं। तो, अगर एग्जिट पोल के हिसाब से भी अगर न्यूनतम दो और अधिकतम सात-आठ सीटें भी महागठबंधन के खाते में आती हैं तो बिहार में राजद का दबदबा बढ़ेगा ही। 2019 में महागठबंधन के खाते से सिर्फ एक कांग्रेसी सांसद चुने गए थे। इस बार का एग्जिट पोल राजद को जिस तरह से दिखा रहा है, उससे पांच-सात सीटें अकेले लालू की पार्टी भी ला सकती है। अगर ऐसा हुआ तो यह राजद के पुराने फैसलों को भी सही बता देगा। बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने सामने आकर भले नहीं किया हो, लेकिन चुना प्रचार की जिस तरह से कमान संभाली थी- उससे साफ लगता है कि सीट बंटवारा किए बगैर प्रत्याशियों को सिम्बल देने में लालू सिर्फ दिखावे के लिए ही थे। लालू प्रसाद अपनी बेटियों को छोड़ किसी प्रत्याशी के प्रचार में सक्रिय नहीं दिखे, जबकि राजद में भी कमान अकेले तेजस्वी ने संभाल रखी थी।
राहुल गांधी कांग्रेसी सीट तक सिमटे, वामपंथी भी कम दिखे
बिहार का एग्जिट पोल दिखाते समय एजेंसियों ने कहीं इंडी एलायंस तो कहीं कांग्रेस+ लिखा, जबकि हकीकत यह है कि यहां राजद+ या महागठबंधन ही चुनाव में उतरा था। इंडी एलायंस के किसी नए दल को बिहार में मौका नहीं मिला। इसके अलावा, इंडी एलायंस के प्रमुख दल कांग्रेस का वजूद भी यहां राजद पर आश्रित रहा। कांग्रेस मुख्यालय में स्वागत के बावजूद पार्टी पप्पू यादव को पूर्णिया और निखिल कुमार को जहानाबाद से टिकट नहीं दिला सकी। राजद ने कांग्रेस से सीट बंटवारा किए बगैर ही प्रत्याशी घोषित कर दिए थे। चुनाव प्रचार में इसका असर भी दिखा। राहुल गांधी दिखाने के लिए भले ही बिहार आने पर साथ रहे, लेकिन यह उससे ज्यादा दिखा कि वह महागठबंधन को जिताने के लिए यहां ताकत नहीं झोंक रहे थे। उन्होंने कांग्रेसी प्रत्याशी वाली सीटों पर ही प्रचार किया। राजद या वामपंथी साथी उनकी प्राथमिकता में नहीं रहे। वामदलों ने भी अपनी ही सीटों पर फोकस किया। ऐसे में अगर एग्जिट पोल के हिसाब से भी महागठबंधन को परिणाम मिलते हैं तो इसे तेजस्वी यादव की ताकत ही माना जाएगा। वह भी तब, जबकि मंच पर ही दर्द से व्याकुल होकर उतारे जाने के बावजूद तेजस्वी ने व्हील चेयर के सहारे ही 26 दिनों तक प्रचार किया।