तेजस्वी का राजनीतिक बदला भी पूरा
नीतीश कुमार ने राम विलास और चिराग की लोजपा को चित करने के लिए मांझी की 'हम' को मिलाया था। यह तेजस्वी के लिए झटका था। अब चिराग ने जो किया है, वह जद (यू) के लिए झटका है। महादलित के नेता नीतीश कुमार के साथ गए तो बिहार में दलितों की पार्टी अलग हो गई। वोटों की काट में नीतीश कुमार का गणित कुछ ज्यादा गड़बड़ाता जा रहा है। बिहार की राजनीति के जानकार कहते हैं कि मुसलमान पहले से नीतीश कुमार की समझौतावादी नीतियों को लेकर भड़का हुआ है। बाढ़ और कोविड-19 संक्रमण काल में मजदूरों के घर लौटने और बिहार सरकार के स्टैंड ने भी निचले तबके में खास नाराजगी पैदा कर दी है। दूसरे उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा ने राजद का साथ राजग की आस में छोड़ा, लेकिन नीतीश के राजनीतिक अहंकार ने उसे भी यहां फटकने नहीं दिया। जबकि उपेन्द्र कुशवाहा की रालोसपा भी कोइरी, कुशवाहा समाज में पकड़ रखती है। यह नीतीश कुमार की कुर्मी बिरादरी के साथ जुड़ने वाली जाति है। कुशवाहा बसपा के साथ चुनाव लड़ रहे हैं। कुल मिलाकर दलित वोटों का भी जद (यू) को झटका लगने के पूरे आसार हैं।
चक्रव्यूह के मास्टर माइंड हैं केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह
इस पूरे राजनीतिक खेल का मुख्य मास्टरमाइंड पूर्व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को माना जा रहा है। पूर्व भाजपा अध्यक्ष और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह देश की राष्ट्रीय राजनीति को अपने तमाम प्रयोगों से नई दिशा देने के लिए जाने जाते हैं। यह अंदर की बात है कि अमित शाह कोई भी कैनवास बिना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सहमति के तैयार नहीं करते। बिहार विधानसभा चुनाव में सफलता पाने के लिए महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को टीम में लाना भी इसी नीति का हिस्सा है। वह अमित शाह ही हैं जिन्होंने चिराग से लंबी बात की, चिराग की जेपी नड्डा से भी लंबी बात हुई और इसके बाद चिराग ने अपना निर्णय लिया। नीतीश कुमार ने जोर लगा लिया, लेकिन भाजपा ने चिराग से नाता नहीं तोड़ा। अब अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा की तैयारी बिहार में भाजपा को नंबर वन राजनीतिक दल बनाने की है। उनके इस अभियान में लोकजनशक्ति पार्टी के चिराग पासवान और रालोसपा के उपेन्द्र कुशवाहा काफी सहायक हो सकते हैं। बताते हैं उपेन्द्र कुशवाहा को भी राजग (एनडीए) में लौटने का सपना भाजपा ने ही दिखाया था। एनडीए में कुशवाहा नहीं खपे, तो वोटों के बंटवारे के सीन में बसपा से तालमेल हो गया। राजनीति की भाषा में मानें तो नीतीश कुमार के साथ रहकर भाजपा ने नया ककहरा गढ़ दिया है।
भाजपा के रास्ते से हट गए कांटे
बिहार विधानसभा चुनाव कई मायनों में रोचक है। राजनीति के दांव-पेंच में नीतीश कुमार बड़े-छोटे भाई के फेर में उलझे रहे। लेकिन राजनीति के विश्लेषक मानते हैं कि अब बड़ा झटका उन्हें ही लगने वाला है। क्योंकि राज्य विधानसभा चुनाव में अगड़ी जातियों समेत तमाम वर्गों को समेटने में सबसे मजबूत स्थिति और सीटों के हिसाब से बड़ा राजनीतिक दल होने की संभावना भाजपा की ही बन रही है। एनडीए ने मुख्यमंत्री का चेहरा नीतीश कुमार को घोषित किया है। इसलिए एनडीए की मजबूती नीतीश कुमार का दायित्व है। लेकिन चुनाव में सबसे ज्यादा दुश्मन भी नीतीश कुमार और उनकी पार्टी के ही हैं। राजद, कांग्रेस, बसपा, रालोसपा, लोजपा के निशाने पर जद (यू) हैं। भाजपा के एक केंद्रीय मंत्री तो यहां तक कहते हैं कि देख लीजिए। सभी गणित में भाजपा ही नंबर वन है। हमारे राज्य से सबसे अधिक लोकसभा सांसद हैं। चुनाव बाद विधायकों की संख्या भी नंबर वन रहने वाली है।