देश के सर्वोच्च न्यायालय ने इसी साल जनवरी में बिहार की जातीय जनगणना पर सुनवाई से इनकार किया था, लेकिन अब CJI ने सुनवाई की तारीख दे दी है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के ड्रीम प्रोजेक्ट को जोर का झटका लग सकता है, क्योंकि सुनवाई की सहमति जिन दो आधारों पर दी गई है- उसे अस्वीकार करना मुश्किल होगा।
नीतीश सरकार को मुश्किल में डालने वाली खबर
हाईकोर्ट आकर फिर सुप्रीम कोर्ट क्यों गया मामला
सुप्रीम कोर्ट ने पहले कहा था कि यह मामला आर्टिकल 32 के तहत नहीं आता है, इसलिए राज्य सरकार से जुड़े होने के कारण इसकी सुनवाई पटना हाईकोर्ट में हो। पटना हाईकोर्ट ने केस को स्वीकार या अस्वीकार करने से पहले दलील सुनने की बात कही थी और 18 अप्रैल की तारीख दी थी। इस तारीख पर फिर 4 मई की तारीख दे दी गई। बिहार में जातीय जन-गणना को राज्य सरकार इसी महीने पूरा कराने की तैयारी में है, इसलिए अपीलकर्ताओं ने एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। बताया गया कि जब जनगणना पूरी हो ही जाएगी तो सुनवाई का मतलब नहीं बचेगा। सुप्रीम कोर्ट ने अपील के दो आधारों को मान्य पाते हुए सुनवाई के लिए 28 अप्रैल की तारीख दी है।
इन दो आधारों के कारण फंस सकती है बिहार सरकार
संघ लोक सेवा आयोग के पूर्व सदस्य डॉ. भूरेलाल, दिल्ली के पूर्व पुलिस कमिश्नर आमोद कंठ, बिहार के पूर्व डीजीपी एस. के भारद्वाज, सामाजिक कार्यकर्ता अखिलेश कुमार आदि की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 28 अप्रैल की तारीख दी है। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी है- 1. "बिहार सरकार जातीय गणना के नाम पर एक-एक जन की गणना कर रही है, इसलिए यह जनगणना है। जनगणना का अधिकार सिर्फ केंद्र सरकार के पास है। यह राज्य सूची या संवर्ती सूची में नहीं है। सर्वे बताकर हर आदमी को गिनना जनगणना है और यह राज्य सरकार की ओर से कराना असंवैधानिक है।” 2. “राज्य सरकार एक-एक आदमी को गिनवा रही है और इसमें कई जातियों का नाम गायब है, जबकि कई जातियों का नाम बदल दिया गया है। ऐसे में जिस आदमी की गणना नहीं होगी, उसका मौलिक अधिकार छिन सकता है। आधार समेत सारे दस्तावेज रहने पर भी किसी का मौलिक अधिकार छीनने का हक राज्य सरकार को नहीं है।