"पहले लोग आगे रहते थे, उम्मीदवार पीछे रहता था। अब तो लोगों को पैसा खर्च करके जुटाना पड़ता है।" 90 साल के प्रो रामजी सिंह जब ये बात कह रहे थे तो उनके चेहरे पर मुस्कराहट और पीड़ा दोनों थी।
विज्ञापन
मुस्कराहट अपने वक्त को याद करके और पीड़ा आज को देखकर। प्रो रामजी सिंह 1977 में जनता पार्टी से भागलपुर से सांसद बने, वो अंतरराष्ट्रीय समाज दर्शन परिषद के मानद अध्यक्ष और एफ्रो एशियाई दर्शन परिषद के सचिव रहे।
24 देशों की यात्रा की और इस उम्र में भी ग्राम स्वराज के लिए सक्रिय हैं। आज़ादी के आंदोलन से निकले रामजी सिंह ने जब चुनाव लड़ा तो एक पैसा भी खर्च नहीं किया।
विज्ञापन
वो कहते हैं, "मैंने जब चुनाव लड़ा तो अपराधियों के गढ़ तक में गए, लेकिन कभी किसी ने चोट नहीं पहुंचाई, बल्कि वो हमसे डरते थे। अब तो ये सब कुछ सपने जैसा लगता है, आज मैं चुनाव लड़ना चाहूँ तो लोग मेरी जात पूछेंगें।"
लालटेन की रोशनी में पड़ा वोट
92 साल के गणेश शंकर विद्यार्थी के पास भी बीती राजनीति के दिलचस्प किस्से हैं। वो सीपीएम के टिकट पर 1977 और 1980 में नवादा से दो बार विधायक चुने गए, वो 1952 से ही चुनाव लड़ रहे थे, लेकिन परिवार कांग्रेसी था।
परिवार वाले ही उनके ख़िलाफ़ प्रचार करते, जिसका नतीजा ये कि बहुत कम वोटों के अंतर से वो हार जाते। गणेश शंकर छात्र जीवन में आज़ादी के आंदोलन में सक्रिय रहे। छात्रों के मसलों को उठाना, जेल जाना और हड़तालों ने उन्हें छात्र नेता के तौर पर स्थापित किया।
लेकिन वो लगातार हार रहे थे सो चुनाव से तौबा कर ली, लेकिन 77 में साथियों ने जबरन नामांकन करवा दिया। साथियों के पैसे से नामांकन हुआ और सबसे सहयोग लेकर कार्यकर्ताओं के लिए चूरा, सत्तू, चावल, दाल, आटे की व्यवस्था की गई।
गणेश शंकर विद्यार्थी बताते है, "रोजाना सुबह 6 बजे से गांव गांव पैदल घूमते थे और रात के 9 बजे तक घूमते रहते थे। जब वोट पड़ा तो लालटेन जलवाना पड़ा, लोगों की लंबी कतारें लगी थीं। जात पात का कोई बंधन उस वक्त नहीं दिख रहा था, मैं 40 हजार वोट से जीता।"
वो कहते हैं, "62 आते आते पैसे वालों का दख़ल शुरू हो गया था लेकिन 85 में तो ये खुलेआम दिखने लगा। मुद्दे छूटते गए और जाति और पैसा सब कुछ हो गया।"
95 साल के एलपी शाही अपने पटना के बोरिंग रोड स्थित बड़े से घर में लेटे हुए हैं। उनके घुटनों में तकलीफ़ है और वो ज़्यादा देर बैठ नहीं सकते। एलपी शाही 1957 में बिहार सरकार में उद्योग, ट्रांसपोर्ट, खनन और जन संपर्क मंत्री रहे। बाद में वो कई कांग्रेस शासित राज्य सरकार और केन्द्र सरकार में भी मंत्री रहे।
वो बताते हैं कि 1952 और 57 के चुनाव में उन्होंने सिर्फ पांच हज़ार खर्च किए, लेकिन 1962 के बाद ये खर्च बढ़ गया। गाँव देहात में कांग्रेस की बहुत धाक थी, बस पता चल जाए कि नेता आने वाला है तो लोग खाना बनाकर तैयार रहते थे।
अब की राजनीति से निराश एलपी शाही कहते हैं, "अब सब प्रचार पर चलता है। ना तो नेता वैसा रहा, ना वोटर, उनका रिश्ता भी पहले जैसा नहीं है। चुनाव में लालू जी जातीयता कर रहे हैं और प्रचारक तो तानाशाह की तरह बर्ताव कर ही रहे हैं।"