बिहार में 28 अक्टूबर को पहले चरण का मतदान होगा। इस दौरान राजनीतिक पार्टियों के प्रत्याशियों की चर्चा है तो लोगों की जुबां पर वो किस्से भी हैं, जो आज की पीढ़ी को हैरान कर देते हैं। इन्हीं किस्सों में से खास है 1952 के विधानसभा चुनाव का एक किस्सा, क्योंकि उस दौरान राज्य में एक सीट पर 2-2 विधायक चुने गए थे और ऐसा 2 विधानसभा सीटों पर हुआ था। दरअसल, उस दौर में लालगंज और महुआ विधानसभा क्षेत्र दो सदस्यीय था।
1952 में हुआ था पहला विधानसभा चुनाव
आपको बता दें कि आजाद भारत में पहला आम चुनाव 1952 में हुआ था और उसी दौरान बिहार में पहला विधानसभा चुनाव भी आयोजित कराया गया था। उस वक्त चुनाव आयोग के पास काफी कम कर्मचारी होते थे। ऐसे में चुनाव के लिए बनाई गई टीम अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में 15-15 दिन तक घूमती थीं औैर मतदान कराती थीं। सबसे अहम बात यह है कि उस वक्त मतपत्रों पर उम्मीदवारों के नाम नहीं होते थे। उन पर सिर्फ चुनाव चिह्न होते थे।
2 सदस्यीय थे ये दोनों विधानसभा क्षेत्र
जानकारी के मुताबिक, 1952 के दौरान वैशाली उस वक्त मुजफ्फरपुर जिले के अंतर्गत आता था। वहीं, वैशाली अनुमंडल के दो विधानसभा क्षेत्र लालगंज और महुआ दो सदस्यीय थे। इनमें एक-एक सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित थी, जबकि एक-एक सीट सामान्य वर्ग के लिए। चुनाव विश्लेषकों के मुताबिक, 2 सदस्यीय सीट होने और उनके अलग-अलग वर्ग के लिए आरक्षित होने को लेकर धारणा थी कि आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर अनुसूचित जाति के प्रत्याशी को सामान्य वर्ग के प्रत्याशी से क्षेत्र में मदद मिलेगी। माना जाता है कि उस वक्त ऐसा होता भी था।
पहले चुनाव में इन्हें मिली थी जीत
गौरतलब है कि 1952 के दौरान बिहार में हुए पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने लालगंज विधानसभा क्षेत्र में सामान्य सीट से एलपी शाही और अनुसूचित जाति सीट से चंद्रमणि लाल चौधरी को मैदान में उतारा था। उस चुनाव में एलपी शाही ने स्वतंत्र उम्मीदवार ब्रह्मानंद गुप्ता को हराया था। वहीं, महुआ विधानसभा सीट से वीरचंद्र पटेल ने जीत हासिल की थी। इस पूरे किस्से का जिक्र पूर्व मंत्री एलपी शाही ने अपनी आत्मकथा, 'बनते बिहार का साक्षी' में भी किया है। उन्होंने लिखा है कि उस चुनाव में बड़े क्रांतिकारी नेता योगेंद्र शुक्ल लालगंज सीट पर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के टिकट से लड़े थे, लेकिन चुनाव हार गए।