बिहार में इन दिनों एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) बच्चों पर कहर बनकर टूट रहा है। इसे दिमागी बुखार या जापानी बुखार के नाम से भी जाना जाता है। अब तक इसके कारण 150 से ज्यादा बच्चे मौत की नींद सो चुके हैं। मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। इस मुद्दे को लेकर राजनीति भी गर्माई हुई है। शुक्रवार को एईएस का मु्द्दा संसद के दोनों सदनो में उठाया गया था। राज्यसभा में मृतक बच्चों को श्रद्धांजलि भी दी गई थी। डॉक्टरों का कहना है कि इस बीमारी का कोई सटीक इलाज नहीं हैं। वहीं जो बच्चे इस बीमारी को मात देकर ठीक हो गए हैं उनपर भविष्य में इस बीमारी का असर दिखाई दे सकता है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार मुजफ्फरपुर जिले के गंगापुर गांव की रहने वाली अनुसूचित जाति की मुना देवी के नाती को दो साल पहले एईएस ने जकड़ लिया था। हालांकि वह इस बीमारी के चंगुल से बचने में कामयाब रहा लेकिन वह दोबारा पहले की तरह सामान्य नहीं रहा। उसमें जल्द ही मानसिक बीमारी के लक्षण दिखाई देने लगे। देवी ने कहा, 'शुरुआत में सब ठीक था लेकिन फिर उसका व्यवहार बदलने लगा।' वह अपने नाती को इलाज के लिए उत्तरी पटना में स्थित एक निजी अस्पताल लेकर गई थीं।
देवी ने कहा, 'मैं लोगों को जानती हूं जो श्री कृष्ण मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (एसकेएमसीएच) में अपने बच्चों को भर्ती कराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाते हैं। एसकेएमसीएच में जाने के लिए आपके पास पहुंच होनी चाहिए। यदि हम इंतजार करते और अपने बच्चे को निजी क्लिनिक में न ले जाते तो शायद वह मर जाता।' उनका परिवार बच्चे की दवाई में काफी ज्यादा पैसा खर्च कर चुका है। उन्हें नहीं पता कि अभी कितना पैसा और लगेगा। मुना देवी ने कहा, 'कभी वह सामान्य व्यवहार करता है। लेकिन कभी नहीं करता। जब हमने डॉक्टरों से पूछा तो उन्होंने कहा कि दिमागी बुखार के कारण ऐसा हो रहा है।'
मुना देवी ने कहा, 'हम मुसहर जाति से ताल्लुक रखते हैं। यह दलितों में सबसे पिछड़ी जाति है। नेता केवल चुनाव के दौरान हमसे मिलने के लिए आते हैं। किसी को हमारी कोई फिक्र नहीं है।' वहीं एईएस से उबरा दूसरा बच्चे अंकुल भी सामान्य व्यवहार नहीं कर रहा है। उसके 38 साल के पिता छोटू मांझी एक दिहाड़ी मजदूर हैं। उनका कहना है, 'हम कर्ज में डूबे हुए हैं क्योंकि बेटे के इलाज पर बहुत ज्यादा पैसा खर्च हो चुका है। हमारे पास उसके इलाज को आगे ले जाने के लिए कोई साधन नहीं है। मैंने गांव के सरपंच से आर्थिक मदद की गुहार लगाई लेकिन उन्होंने साफ तौर पर मना कर दिया।'
मांझी रोजाना 300 रुपये कमाते हैं। उन्होंने कहा, 'हमें अभी तक अधिकारियों से किसी तरह की कोई आर्थिक मदद नहीं मिली है।' गंगापुर गांव की जनसंख्या 3,000 है। एक बार फिर यह गांव एईएस की चपेट में है। बड़े पैमाने पर फैली गरीबी यहां की एक जटिल समस्या है। एसकेएमसीएच अस्पताल के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉक्टर ब्रिजमोहन ने कहा, 'लगभग 5-10 प्रतिशत बच्चे जो एईएस से उबरते हैं उन्हें विभिन्न रोग जकड़ लेते हैं। जिसमें असामान्य व्यवहार, दृष्टिदोष, बहरापन और आंशिक पक्षाघात शामिल है।'