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मधुबनी: मखानों के शहर में विरासत और सियासी तजुर्बे का कड़ा इम्तिहान

Sat, 04 May 2019 04:13 AM IST
Avdhesh Kumar चुनाव डेस्क, अमर उजाला
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हुकुमदेव नारायण यादव-अशोक यादव - फोटो : Amar Ujala
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मिथिला चित्रकला और मखानों के लिए विख्यात मधुबनी संसदीय क्षेत्र में इस बार भाजपा सीट बचाने के लिए मैदान में है। राजनीतिक विरासत की परीक्षा भी यहां होनी है। दो चुनाव से लगातार जीत रहे भाजपा सांसद हुकुमदेव नारायण के बेटे अशोक यादव भाजपा के टिकट पर मैदान में हैं। वहीं, महागठबंधन ने विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के बद्री पूर्वे को उतारा है। पूर्वे यहां के ताकतवर सूरी समाज से हैं। इसके बावजूद महागठबंधन के सामने कई चुनौतियां हैं।

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एक चुनौती निर्दलीय चुनाव लड़ रहे शकील अहमद ने पेश की है। दो बार कांग्रेस से सांसद रह चुके शकील निर्दलीय मैदान में हैं। महागठबंधन की दो प्रमुख पार्टियों कांग्रेस और राजद की वजह से यहां चुनावी समीकरण और उलझ गए हैं। राजद नेता अली अशरफ फातमी भी बागी तेवर अपनाए हुए हैं। इस सीट पर यादव और मुस्लिम मतदाताओं की खासी संख्या है और चुनाव परिणाम पर ब्राह्मण और अति पिछड़ा वर्ग का प्रभाव रहता है। 

वामपंथ का गढ़ भी रही यह सीट

भाकपा के भोगेंद्र झा यहां से पांच बार सांसद बने। 1976 में परिसीमन के बाद मधुबनी सीट बनी। 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर हुकुमदेव नारायण जीते। इसके बाद 1980, 1989 और 1991 के चुनाव में भोगेंद्र जीते। 1996 में भाकपा के चतुरानन मिश्र सांसद बने। इसके बाद 1999 में भाजपा, 2004 में कांग्रेस को जीत मिली। पिछले दो चुनाव से यह सीट भाजपा के पास है।
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मधुबनी सीट से सांसद
1998    शकील अहमद    कांग्रेस
2004    शकील अहमद    कांग्रेस
2009    हुकुमदेव नारायण    भाजपा
2014    हुकुमदेव नारायण    भाजपा

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