राज्य के करीब चार हजार सरकारी डॉक्टर 48 घंटे की हड़ताल पर चले गये हैं। डॉक्टर सोमवार मध्यरात्रि से हड़ताल पर हैं। इसके चलते प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, रेफरल अस्पताल, अनुमंडलीय अस्पताल और सदर अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाएं रुकी हुई हैं। हड़ताल के कारण ओपीडी में आनेवाले करीब दो लाख मरीजों की जान खतरे में पड़ गयी है।
स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव व्यासजी ने इस हड़ताल को जनविरोधी बताते हुये कहा कि हड़ताल के दौरान अस्पतालों में किसी तरह की घटना की जिम्मेदारी डॉक्टरों की होगी। इस हड़ताल में मेडिकल कॉलेज अस्पताल शामिल नहीं हैं। डॉक्टरों ने 14 फरवरी से अनिश्चितकालीन हड़ताल की भी घोषणा की है।
डॉक्टरों ने सरकार से हुई वार्ता और उसके बाद उनकी मांगों के संबंध में गठित कमेटी की सिफारिशों से संतुष्ट न होने के चलते हड़ताल पर जाने की घोषणा की। डॉक्टरों की मांगों को लेकर स्वास्थ्य सचिव संजय कुमार की अध्यक्षता में गठित कमेटी के साथ सोमवार को दो राउंड की बातचीत हुई थी। बातचीत के बाद कमेटी ने वित्तीय मांगों को छोड़ अन्य मांगों को पर सैद्धांतिक सहमति जतायी। बिहार स्वास्थ्य सेवा संघ (भासा) ने इस बैठक को बेनतीजा बनाया है और सिफारिश को संतोषजनक नहीं बताया है।
मालूम हो है कि अनुबंध पर नियुक्त डॉक्टरों की सेवा नियमित करने के लिये बीपीएससी से विज्ञापना निकाला गया था। भासा की मांग थी कि विज्ञापन की तारीख को वापस लिया जाये लेकिन सरकार ने इसे वापस नहीं लिया। डॉक्टरों के साथ बैठक के बाद स्वास्थ्य विभाग के अपर सचिव राजेंद्र प्रसाद ओझा ने बताया कि कमेटी अपनी अनुशंसा शाम में सरकार के पास भेज दी है। अनुबंध पर बहाल डॉक्टरों की सेवा नियमित करने पर सैद्धांतिक सहमति बन गयी है।
उन्होंने कहा कि अस्पतालों में बड़ी संख्या में रिक्तियां हैं। बीपीएससी ने डॉक्टरों की सेवा को स्थायी करने के लिए विज्ञापन निकाला है। इसमें दूसरे राज्य के डॉक्टरों ने भी आवेदन किया होगा। इसके मद्देनजर सरकार कोई फॉर्मूला तैयार करेगी। साथ ही अनुबंध पर नियुक्त राज्य के सभी कर्मचारियों के लिए सामान्य प्रशासन के माध्यम से एक नीतिगत निर्णय लिया जाना है। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग सेवा स्थायी करने का तत्काल आश्वासन नहीं दे सकता।