अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप सुपर-30 के आनंद कुमार ने एक बार फिर सफलता का परचम लहराया है। जेईई एडवांस के घोषित परिणाम में 30 में से 27 छात्रों ने क्वालीफाई कर लिया है। ये सभी छात्र पिछड़े वर्ग से संबंध रखते हैं।
इस साल जिन बच्चों में परीक्षा पास की है, उनमें से कई बच्चे जूते ठीक करने, सड़क पर ठेला या सब्जी बेचने वालों के बच्चे हैं। दिहाड़ी मजदूरी करने वाले के बेटे सुनील की आंखों में खुशी के आंसू साफ देखे जा सकते थे।
चयनित धनंजय के पिता बेचते हैं सब्जी
सुनील ने कहा, ‘आनंद सर गरीबों के लिए जो कर रहे हैं, वह सिर्फ मसीहा ही कर सकता है। मैं भी उनके ही नक्शेकदम पर चलने की कोशिश करूंगा।’ धनंजय कुमार के पिता सब्जी बेचते हैं और उसे भी वह दुकान ही बैठाना चाहते थे।
मगर धनंजय ने अपनी पढ़ाई के साथ समझौता नहीं किया, उसने खाली समय में पढ़ाई जारी रखी और पैसे बचाकर किताबें खरीदीं। इसी के चलते उसने सुपर-30 का फॉर्म खरीदने के लिए 50 रुपये तक चुराए।
मजदूर के बच्चे का भी चयन
उत्तर प्रदेश के मणीराम सिंह को भी यहां तक पहुंचने के लिए अपनी किस्मत से लड़ना पड़ा। मजदूर पिता के पास उसके लकवे का इलाज कराने के लिए पैसा नहीं था।
मणीराम ने कहा, ‘मैं जानता था कि शारीरिक अक्षमता के चलते मैं बहुत ज्यादा कुछ नहीं कर सकता हूं।
मगर मैं पढ़ाई करना चाहता था। लेकिन मेरी पहुंच स्थानीय सरकारी स्कूल से आगे नहीं थी।’ नालंदा जिले के सुधीर ने भी अपने उन पुराने दिनों को याद किया, जब वह अपने मोची पिता के साथ दुकान पर बैठा करता था।
2001 से 308 छात्र चयनित
सुधीर ने कहा, ‘एक दिन मैंने एक आदमी के जूते पॉलिश किए और जब मैंने उससे पैसे मांगे, तो वह मुझे गालियां देने लगा।
मुझे बहुत गुस्सा आया, लेकिन मेरे पिता ने मुझे शांत किया और कहा कि बदला लेने का रास्ता है, शिक्षा के माध्यम से असली पावर हासिल की जाए।’
आनंद कुमार ने 2001 में सुपर-30 की शुरुआत की थी और अब तक 360 में से 308 छात्र क्वालीफाई कर चुके हैं।