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सम्मान वापसी से ही शुरू हुआ था चंपारण सत्याग्रह

Mon, 11 Apr 2016 01:54 AM IST
आशीष झा/ अमर उजाला, पटना

सार

  • आयुक्त के अभद्र व्यवहार से खफा गांधी ने लौटाया था कैसर-ए-हिंद सम्मान
  • नैतिक रूप से कमजोर अंग्रेज सरकार के वाइसराय ने रोक दी थी गिरफ्तारी
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- फोटो : Getty Images
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विस्तार
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महात्मा गांधी का चंपारण सत्याग्रह धरना, उपवास या सभा से नहीं, बल्कि सम्मान वापसी से ही शुरू हुआ था। राज कुमार शुक्ल के आग्रह पर सौ साल पहले 10 अप्रैल 1917 को बिहार आये महात्मा गांधी का मोतिहारी पहुंचना आसान नहीं था। मुजफ्फरपुर में ही उनकी गिरफ्तारी की योजना तैयार थी। ऐसे में गांधी का मोतिहारी पहुंचना और वहां सामाजिक बदलाव का काम शुरू करने के पीछे उनका सम्मान वापसी का प्रस्ताव काफी प्रभावी रहा। इससे अंग्रेज सरकार बापू के आगे पहले ही वार में नैतिक रूप से कमजोर हो गई।
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चंपारण पर शोध करनेवाले भैरव लाल दास की आनेवाली पुस्तक ‘चंपारण में गांधी व उनके स्वयंसेवक’ के अंशों के अनुसार 13 अप्रैल, 1917 को तिरहुत के आयुक्त मोर्सिड ने मुजफ्फरपुर में मलकानी के घर ठहरे महात्मा गांधी को तलब किया। मुलाकात पर मोर्सिड ने गांधी से सख्त लहजे में सवाल किया कि आप को यहां किसने बुलाया है, आप यहां क्या करने आये हैं, आपको पता है कि अभी बंदोबस्ती का काम चल रहा है, आप हमारे लिए वांछित हैं, आप तत्काल तिरहुत छोड़ कर चले जायें, वर्ना हम आपको गिरफ्तार कर लेंगे।

आपके लिए धारा 144 लागू कर दी गयी है। मोर्सिड के इस अभद्र व्यवहार से गांधी काफी मर्माहत हुए और उन्होंने अपने पुत्र देवदास गांधी के माध्यम से ब्रिटिश सरकार से मिले कैसर-ए-हिंद सम्मान लौटाने की सूचना तत्कालीन वाइसराय को भेजी।
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गांधी ने लौटाया था कैसर-ए-हिंद सम्मान

- फोटो : Getty Images
इधर, मुजफ्फरपुर में गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए वे मोतिहारी रवाना हो गये। वहां शुक्ल ने गोरख बाबू के घर ठहरने की व्यवस्था की। मोतिहारी पहुंचते ही बापू को एसडीओ का समन मिला। इसके बावजूद उन्होंने हाथी पर सवार होकर चंद्रहटी गांव का दौरा किया और नील किसानों की हालत देखी। वहां से लौटने के बाद बापू इस बात के लिए तैयार हो चुके थे कि अंग्रेज सरकार उन्हें गिरफ्तार करेगी। इसलिए वे मजहरुल हक, राजेंद्र प्रसाद और ब्रजकिशोर बाबू से आगे की रणनीति पर विचार करने के बाद कोर्ट में पेश हुए।

कोर्ट में गांधी ने कहा कि वे बिहार में बाहरी नहीं हैं, क्योंकि ये देश उनका भी है। देश में काम करने से उन्हें कोई नहीं रोक सकता और वे यहां काम करने आये हैं। गांधी ने कहा कि उन्होंने नियम तोड़ा है और आगे भी तोड़ेंगे, इसलिए आप चाहें तो हमें गिरफ्तार कर सकते हैं। मैं ना काम रोकने वाला हूं और न ही यहां से जाने वाला हूं।

इस बीच, दिल्ली से लेकर पटना तक गांधी के सम्मान वापसी की धमकी से अंग्रेज सरकार हिल चुकी थी। वाइसराय पत्र की उस लाइन से सकते में थे जिसमें गांधी ने लिखा था कि एक ओर ब्रिटिश सरकार हमें कैसर-ए-हिंद कहती है और दूसरी ओर आपके पदाधिकारी हमें बाहरी बता रहे हैं और मेरे साथ अभद्र व्यवहार कर रहे हैं। ऐसे में इस सम्मान का मेरे लिए कोेई औचित्य नहीं दिख रहा है। वाइसराय ने बिहार के तत्कालीन उपराज्यपाल को तत्काल गांधी से संपर्क साधने को कहा।

साथ ही किसी भी सूरत में गांधी की गिरफ्तारी से पहले उनकी इजाजत लेने का आदेश दिया। वाइसराय के इस टेलीग्राम के बाद बिहार के प्रशासनिक हलकों में भूचाल आ गया। शाम होते होते तिरहुत के आयुक्त, मोतिहारी के जिलाधिकारी और एसडीओ का तबादला कर दिया गया। चंपारण सत्याग्रह में यह गांधी की पहली नैतिक जीत थी, जो बाद में चंपारण समझौते तक कायम रही। यह अलग बात है कि गांधी ने चंपारण में सामाजिक बदलाव का जो पहला प्रयोग किया उसमें वे पूरी तरह नाकाम रहे। महज छह माह बाद ही उनके सारे स्वयंसेवक चंपारण से लौटने लगे और मधुबन, बरहरबा व भितहरबा जैसे स्कूल बंद होने लगे।
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