उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं और आर्थिक विकास की वज़ह से शहरीकरण बढ़ रहा है। छोटे शहरों और गावों में जहां रोजगार के अवसर नहीं हैं वहां के लोग नौकरी की तलाश में शहरों का रुख करते हैं। जिसकी वजह से ऊर्जा और परिवहन अवसंरचना पर दबाव तो बढ़ता ही है और साथ ही शहरों में न सिर्फ भीड़भाड़ होती है बल्कि प्रदूषण भी बढ़ता है। ऐसे में इलेक्ट्रिक वाहनों के इस्तेमाल से बढ़ते प्रदूषण पर काफी हद तक रोक लगाईं जा सकती है।
ग्लोबल तापमान लगातार बढ़ रहा है जिसकी वजह से जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल और उससे होने वाले उत्सर्जन में कमी लाने के प्रयासों पर पहल करने को विवश कर दिया है। आपको बता दे कि भारत में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को साल 2030 तक साल 2005 के स्तर की तुलना में 33 प्रतिशत से 35 प्रतिशत तक कम करने की कमिटमेंट किया है। और यह तभी संभव हो सकता है जब ज्यादा से ज्यादा लोग इलेक्ट्रिक वाहनों का इस्तेमाल करेंगे।
इंटरनल कम्बस्चन इंजन (Internal Combustion Engine) को चलाने के लिए CNG, LPG, पेट्रोल और डीज़ल जैसे महंगे फ्यूल की जरूरत होती है। जानकारी के लिए बाते दें कि भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत कच्चा तेल इम्पोर्ट करता है और और जिस तरह शहरों में लगातार पेट्रोल, डीजल, CNG और LPG के वाहन बढ़ रहे हैं उस लिहाज से इसमें इज़ाफा ही होना ही है, जोकि एनर्जी सेफ्टी के लिहाज से ठीक नहीं है और इनका ज्यादा इस्तेमाल आगे चलकर काफी नुकसानदायक साबित हो सकता है। इसलिए हमें अब इलेक्ट्रिक वाहनों की जरूरत है।
कुछ साल पहले तक इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए जो बैटरी आती थी वो बहुत अच्छी परफॉरमेंस नहीं देती थी, जैसे स्लो चार्जिंग सिस्टम, कम स्पीड, फुल चार्ज में कम दूरी तय करना, लेकिन जैसे-जैसे इलेक्ट्रिक वाहनों पर अपनाने पर जोर दिया गया, इनमें सुधार आते चले गये और बेहतर टेक्नोलॉजी वाली बैटरियां मार्किट में आने लगीं। नई बैटरियों की क्षमता बढ़ी है और लागत कम हुई है। उम्मीद जताई जा रही हैं अगले कुछ सालों में और भी फास्ट चार्ज होने वाली बैटरी और ज्यादा दूरी करने वाली बैटरियां देखने को मिलेंगी।
पिछले दस सालों में पवन और सोर ऊर्जा के प्रोडक्शन टेक्नोलॉजी में हुई प्रगति से इनकी लागत में काफी कमी देखने को को मिली है। जिसकी वजह से कम कार्बन उत्सर्जन वाली ऊर्जा का इस्तेमाल हुआ है। भारत ने साल 2020 तक 175 गीगावॉट रीनूअबल एनर्जी कैपबिलटी जोड़ने और 2020 तक ही गैर-जीवाश्म स्रोतों से कुल बिजली प्रोडक्शन का 40 प्रतिशत हासिल करने का लक्ष्य रखा है। ऐसे में भविष्य में हम काफी हद तक प्रदूषण पर रोक लगा सकेंगे।
लेकिन सवाल यह है कि क्या हम सब इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने के लिए पूरी तरफ से तैयार हैं। क्योकिं अभी भी कई ऐसी चुनौतियां हैं जिन पर काफी गंभीरता से काम करने की जरूरत है। इस समय देश में इलेक्ट्रिक वाहकों के लिये चार्जिंग स्टेशन लगभग न के बराबर हैं और जो हैं उनका इस्तेमाल होता ही नहीं है। दिल्ली जैसे बड़े शहर में कुछ पेट्रोल पम्पों पर चार्जिंग स्टेशन तो हैं लेकिन वो बंद पड़े है। ऐसे में अगर देश में इलेक्ट्रिक वाहनों को हिट करना है तो चार्जिंग स्टेशनों की संख्या बढ़ानी पड़ेगी, एक्सपर्ट मानते हैं कि हर 5 किलोमीटर के भीतर एक चार्जिंग पॉइंट होना ही चाइये। इसके अलावा कंपनियों को ऐसी बैटरी बनानी होंगी जो कम खर्च में ज्यादा चले यानी इनकी माइलेज ज्यादा हो, क्योकिं शहरों में इतना ज्यादा ट्रैफिक होता है कि कम माइलेज वाली बैटरी बीच रास्ते में ही दम तोड़ सकती है। इसके अलावा इलेक्ट्रिक वाहनों की कीमत में भी कमी होना जरूरी है ताकि ये ज्यादा से ज्यादा लोग इन्हें खरीद सकें। और सबसे खास बात तो यह है कि आजकल जितने भी इलेक्ट्रिक वाहन आते हैं सबकी टॉप स्पीड काफी का होती है लेकिन हमारे हिसाब से इनकी स्टैण्डर्ड टॉप स्पीड कम से कम 50 kmph होनी चाइये। अगर हम सब अभी से इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाएंगे तो आने वाला कम हमारा आज से बेहतर होगा।