पायलट प्रोजेक्ट और भविष्य की योजना
ये योजना स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) की ओर से बनाई जा रही है। निकल कॉपर क्रोमियम (NCC) रेल्स के विकल्प के रूप में देखी जा रही है। जबकि रेलवे पहले ही विजयवाड़ा–गुंटूर सेक्शन में रस्ट-फ्री रेल्स का छोटा पायलट स्टडी पूरा कर चुकी है।
इसके अलावा रेलवे ने 1 लाख टन ट्रीटेड स्टील की चरणबद्ध खरीद की योजना बनाई है। इनका उपयोग मुख्य रूप से नई रेल लाइनों के निर्माण में, ट्रैक डबलिंग (दोहरीकरण) में, गेज कन्वर्जन प्रोजेक्ट्स में किया जाएगा। वित्त वर्ष 2026 के लिए आवंटित 2.65 रुपये ट्रिलियन के विशाल कैपेक्स का एक हिस्सा इन परियोजनाओं पर खर्च होगा।
विशेषज्ञ इस योजना को अपनाने की कोशिश तो कर रहे हैं, लेकिन कुछ तकनीक चिंतांए भी जताई गई है। जैसे जिंक कोटिंग अल्ट्रासोनकि क्रैक-डिटेक्शन सेंसर में बाधा डाल सकती है। साइट पर वेल्डिंग से जिंक लेयर हट सकती है और ट्रेन के पहियों से घर्षण के कारण ऊपरी सतह की कोटिंग जल्दी घिस सकती है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इन समस्याओं के तकनीक समाधान संभव हैं और फुल-स्केल रोलआउट से पहले पर्याप्त परीक्षण जरूरी है।
विशेषज्ञों की राय?
रेलवे के पूर्व अधिकारियों के अनुसार, अगर ये तकनीक सफल रहती है, तो ट्रैक की उपलब्धता बढ़ेगी, मेंटेनेंस कम होगा और ट्रेन ऑपरेशन ज्यादा सुरक्षित और भरोसेमंद बन सकेगा। ये कदम कई हाई-स्पीड और हेवी-हॉल ट्रेनों के लिए भी फायदेमंद साबित हो सकता है।