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Indian Railways: रेलवे का मास्टरप्लान! पटरियों को जंग से बचाएगी ये तकनीक, 4 गुना बढ़ेगी उम्र और करोड़ों की बचत

Sun, 11 Jan 2026 01:22 PM IST
जागृति ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

भारतीय रेलवे अब अपनी पटरियों को जंग से बचाने के लिए एक बेहतरीन तकनीक अपनाने जा रही है। खारे पानी और अधिक नमी वाले तटीय इलाकों में जहां सामान्य रेल की पटरियां महज 2-3 साल में दम तोड़ देती हैं, वहीं अब गैल्वेनाइज्ड स्टील रेल्स की मदद से इनकी उम्र 12 साल से ज्यादा हो सकती है। जानिए इसके बारे में विस्तार से...
 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : freepik
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विस्तार
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भारतीय रेलवे के लिए तटीय और उच्च आर्द्रता वाले क्षेत्रों में जंग ट्रैक की सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है। इन इलाकों में सामान्य स्टील रेल्स की उम्र सिर्फ दो  से तीन साल की होती है, जबकि कम जंग वाले क्षेत्रों में यही रेल्स 12 साज तक चल जाती है। इसके कारण रेलवे को बार-बार ट्रैक रिन्यूअल कराना पड़ता है। इसे देखते हुए रेलवे ने जिंक कोटिंग वाली गैल्वेनाइज्ड रेल्स का पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने का निर्णय लिया है।

कैसी होती हैं गैल्वेनाइज्ड रेल्स ?

गैल्वेनाइज्ड रेल्स पर जिंक की कोटिंग होती है, जो नमी और नमक वाले वातावरण में जंग से सुरक्षा देती है। इससे तटीय क्षेत्रों में ट्रैक की उम्र 3 साल से अधिक होने का अनुमान लगाया जा रहा है। यानी की पहले से चार गुना ज्यादा इजाफा।

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हालांकि गैल्वेनाइज्ड रेल्स की कीमत सामान्य रेल्स से करीब 10 प्रतिशत ज्यादा होगी। विशेषज्ञों के अनुसार जहां सामान्य स्टील रेल्स की कीमत 76,000 रुपये प्रति टन है, वहीं गैल्वेनाइज्ड रेल्स 84,000 रुपये प्रति टन की मिलेंगी, लेकिन लंबे समय में ये निवेश बेहद फायदेमंद साबित होगा। क्योंकि हर साल ट्रैक रिन्यूअल में रेलवे का करीब 20 हजार करोड़ रुपये खर्च आता है। ऐसे में अगर रेल्स ज्यादा समय तक चलती हैं, तो लाइफसाइकिल लागत में भारी कमी आएगी और अरबों रुपये की बचत होगी।

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पायलट प्रोजेक्ट और भविष्य की योजना

ये योजना स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) की ओर से बनाई जा रही है। निकल कॉपर क्रोमियम (NCC) रेल्स के विकल्प के रूप में देखी जा रही है। जबकि रेलवे पहले ही विजयवाड़ा–गुंटूर सेक्शन में रस्ट-फ्री रेल्स का छोटा पायलट स्टडी पूरा कर चुकी है। 

इसके अलावा रेलवे ने 1 लाख टन ट्रीटेड स्टील की चरणबद्ध खरीद की योजना बनाई है। इनका उपयोग मुख्य रूप से नई रेल लाइनों के निर्माण में, ट्रैक डबलिंग (दोहरीकरण) में, गेज कन्वर्जन प्रोजेक्ट्स में किया जाएगा। वित्त वर्ष 2026 के लिए आवंटित 2.65 रुपये ट्रिलियन के विशाल कैपेक्स का एक हिस्सा इन परियोजनाओं पर खर्च होगा।

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तकनीकी चुनौतियां भी सामने

विशेषज्ञ इस योजना को अपनाने की कोशिश तो कर रहे हैं, लेकिन कुछ तकनीक चिंतांए भी जताई गई है। जैसे जिंक कोटिंग अल्ट्रासोनकि क्रैक-डिटेक्शन सेंसर में बाधा डाल सकती है। साइट पर वेल्डिंग से जिंक लेयर हट सकती है और ट्रेन के पहियों से घर्षण के कारण ऊपरी सतह की कोटिंग जल्दी घिस सकती है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इन समस्याओं के तकनीक समाधान संभव हैं और फुल-स्केल रोलआउट से पहले पर्याप्त परीक्षण जरूरी है।

विशेषज्ञों की राय?

रेलवे के पूर्व अधिकारियों के अनुसार, अगर ये तकनीक सफल रहती है, तो ट्रैक की उपलब्धता बढ़ेगी, मेंटेनेंस कम होगा और ट्रेन ऑपरेशन ज्यादा सुरक्षित और भरोसेमंद बन सकेगा। ये कदम कई हाई-स्पीड और हेवी-हॉल ट्रेनों के लिए भी फायदेमंद साबित हो सकता है।

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