चीन की पकड़ और कस रही है
क्रिसिल की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ने रेयर अर्थ मटेरियल्स के निर्यात पर अपनी प्रक्रिया और सख्त कर दी है। किसी भी एक्सपोर्ट क्लियरेंस में अब कम से कम 45 दिन लग रहे हैं, और लगातार बढ़ती जांच-पड़ताल से मंजूरी में देर हो रही है। इससे ग्लोबल सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ गया है।
भारत ने पिछले वित्त वर्ष में 540 टन मैग्नेट की जरूरत का 80 प्रतिशत हिस्सा चीन से आयात किया था। लेकिन मई 2025 के अंत तक भारत सरकार ने करीब 30 इंपोर्ट रिक्वेस्ट को मंजूरी दी थी। लेकिन एक भी शिपमेंट को चीन की तरफ से क्लियरेंस नहीं मिल पाया है। इससे भारतीय कंपनियों की शिपमेंट फंसी हुई हैं।
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ईवी सेक्टर के लिए खतरे की घंटी
रेयर अर्थ मटेरियल्स, खासतौर पर मैग्नेट, इलेक्ट्रिक मोटर्स जैसे PMSM (परमानेंट मैग्नेट सिंक्रोनस मोटर्स) के लिए बेहद जरूरी होते हैं। ये मोटर्स ईवी टू-व्हीलर से लेकर हाइब्रिड और आईसीई (इंटरनल कंबशन इंजन) गाड़ियों तक में इस्तेमाल होती हैं। इनमें इलेक्ट्रिक पावर स्टीयरिंग जैसे फीचर्स में भी ये मैग्नेट काम आते हैं।
भारत सरकार जहां 2026 तक ईवी पैसेंजर व्हीकल्स में 35-40 प्रतिशत ग्रोथ का अनुमान लगा रही थी। वहीं अब सप्लाई चेन में आई रुकावट से इस ग्रोथ पर असर पड़ सकता है। टू-व्हीलर ईवी सेक्टर में 27 प्रतिशत ग्रोथ की उम्मीद जताई गई थी। लेकिन यदि हालात नहीं सुधरे तो टाटा मोटर्स, महिंद्रा, बजाज, टीवीएस और ओला जैसे ब्रांड्स की आने वाली लॉन्च भी टल सकती हैं।
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2030 के ईवी लक्ष्य पर भी असर संभव
अगर स्थिति लंबे समय तक यही रही तो भारत सरकार का 2030 तक 30 प्रतिशत फोर-व्हीलर ईवी और 80 प्रतिशत टू या थ्री-व्हीलर ईवी का लक्ष्य भी खटाई में पड़ सकता है। उत्पादन और लॉजिस्टिक दोनों पर बड़ा असर होगा।
क्रिसिल रेटिंग्स के सीनियर डायरेक्टर अनुज सेठी के मुताबिक, ऑटो सेक्टर जैसे ही बड़े पैमाने पर ईवी लॉन्च की तैयारी कर रहा है, वैसा में यह सप्लाई संकट बेहद बुरा समय लेकर आया है। जुलाई 2025 से कई ईवी मॉडल्स की लॉन्चिंग टालनी पड़ सकती है, क्योंकि अभी अधिकांश कंपनियों के पास 4-6 हफ्तों का ही स्टॉक है।
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रेयर अर्थ की निर्भरता और विकल्प
कोविड महामारी के दौरान रेयर अर्थ की सप्लाई स्थिर रही थी, जिसकी वजह से कंपनियों ने इसका स्टॉक करने की जगह "जस्ट इन टाइम" मॉडल को फॉलो किया। लेकिन अब जब 90 प्रतिशत प्रोसेसिंग सिर्फ चीन में हो रही है, तब कोई भी विकल्प जल्दी मिल पाना मुश्किल है।
क्रिसिल की डायरेक्टर पूनम उपाध्याय ने बताया कि इन मैग्नेट्स की कीमत गाड़ी की कुल लागत का सिर्फ 5 प्रतिशत होती है। लेकिन इनकी जरूरत इतनी ज्यादा है कि इनके बिना ईवी मोटर और इलेक्ट्रिक स्टीयरिंग संभव नहीं। कंपनियां अब वियतनाम, इंडोनेशिया, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे देशों में वैकल्पिक सप्लायर्स की तलाश में जुट गई हैं।
अगर संकट ज्यादा लंबा चला तो ये छोटे और सस्ते दिखने वाले मैग्नेट ऑटो इंडस्ट्री के लिए सबसे बड़ा अड़ंगा बन सकते हैं। ऐसी स्थिति में कंपनियां इन मैग्नेट्स को ICE गाड़ियों के लिए डायवर्ट कर सकती हैं, जिससे ईवी सेक्टर की ग्रोथ पर ब्रेक लगना तय है।
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