केंद्र सरकार ने कृषि और निर्माण क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले वाहनों के लिए उत्सर्जन नियमों को और कड़ा कर दिया है। सरकार का कहना है कि तय तिथियों के बाद खरीदे जाने वाले नए ट्रैक्टर और भारी मशीनों में ऐसे एडवांस्ड एमिशन कंट्रोल सिस्टम होंगे, जो हानिकारक उत्सर्जन कम करने और ईंधन दक्षता बेहतर बनाने में मदद करेंगे।
देश में प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने अब एक बेहद बड़ा और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। सरकार ने कृषि ट्रैक्टरों, पावर टिलर, कंबाइन हार्वेस्टर और कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट व्हीकल्स (CEV) के लिए नए और बेहद सख्त उत्सर्जन मानकों को अधिसूचित कर दिया है।
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा 'मोटर वाहन अधिनियम, 1988' की धारा 110 के तहत 'केंद्रीय मोटर वाहन (ग्यारहवां संशोधन) नियम, 2026' के अंतर्गत यह नया बदलाव जारी किया गया है। इन सख्त नियमों को 1 अक्टूबर 2026 से चरणों में लागू किया जाएगा। जिसके अगले पड़ाव अप्रैल 2028 और अप्रैल 2032 में आएंगे।
इस नए संशोधन के जरिए खेती और निर्माण कार्य में इस्तेमाल होने वाली भारी मशीनों की तकनीक को पूरी तरह अपग्रेड किया जा रहा है:
स्टेज-V की एंट्री: नए नियमों के तहत कृषि मशीनरी के लिए 'ट्रैक्टर एमिशन नॉर्म्स' (TREM) स्टेज-V और कंस्ट्रक्शन उपकरणों के लिए 'CEV स्टेज-V' मानकों को लागू किया जाएगा।
हानिकारक गैसों पर लगाम: इन नए मानकों में कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), हाइड्रोकार्बन (HC), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) और पार्टिकुलेट मैटर (PM) के उत्सर्जन की सीमा को पहले से काफी कम कर दिया गया है।
अल्ट्रा-फाइन कणों पर पहली बार रोक: देश में पहली बार तय इंजन श्रेणियों के लिए 'पार्टिकल नंबर' (PN) की सीमाएं भी तय की गई हैं ताकि हवा में मिलने वाले बेहद बारीक हानिकारक कणों के उत्सर्जन को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सके।
40% तक कम होगा पीएम (PM): नए मानकों के मुताबिक, 56 kW से 130 kW कैटेगरी वाले इंजनों के लिए उत्सर्जन सीमा इस प्रकार तय की गई है:
कार्बन मोनोऑक्साइड (CO): 5.0 g/kWh
हाइड्रोकार्बन (HC): 0.19 g/kWh
नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx): 0.4 g/kWh
पार्टिकुलेट मैटर (PM): केवल 0.015 g/kWh (यह सीमा पिछले स्टेज-IV मानक के मुकाबले करीब 40 फीसदी कम है)।
सभी श्रेणियों के इंजनों को नए नियमों के दायरे में लाने के लिए सरकार ने एक सटीक टाइमलाइन बनाई है:
कृषि ट्रैक्टर और कंबाइन हार्वेस्टर के लिए:
1 अक्तूबर 2026 से: 56 kW से 560 kW रेंज वाले इंजनों और छोटे 8 kW से 19 kW रेंज वाले इंजनों के लिए TREM स्टेज-V अनिवार्य हो जाएगा।
1 अप्रैल 2028 से: 19 kW से 37 kW कैटेगरी के इंजन पहले TREM स्टेज-IIIAA पर शिफ्ट होंगे।
1 अप्रैल 2032 से: 19 kW से 37 kW वाले इंजन पूरी तरह स्टेज-V अपनाएंगे। साथ ही 37 kW से 56 kW कैटेगरी के इंजनों के लिए भी इसी तारीख से स्टेज-V अनिवार्य होगा।
कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट व्हीकल्स (CEV) के लिए:
56 kW से ऊपर के इंजनों वाले कंस्ट्रक्शन वाहनों को 1 अक्तूबर 2026 से CEV स्टेज-V का पालन करना होगा, जबकि इससे छोटी इंजन श्रेणियां पहले से ही स्टेज-V की आवश्यकताओं के तहत कवर की जा चुकी हैं।
संशोधन में एक बेहद अनूठा और सख्त नियम जोड़ा गया है, जिसे 'इन-सर्विस एमिशन मॉनिटरिंग' नाम दिया गया है:
पूरी उम्र देना होगा टेस्ट: अब ट्रैक्टर और कंस्ट्रक्शन उपकरणों की कुछ श्रेणियों को केवल शुरुआत में सर्टिफिकेट (टाइप अप्रूवल) लेते समय ही नहीं, बल्कि अपने पूरे कामकाजी जीवन के दौरान इन कड़े उत्सर्जन मानकों पर खरा उतरना होगा।
निगरानी की समयसीमा: 1 अक्तूबर 2026 के बाद बनने वाले 19 kW से कम और 56 kW से अधिक वाले इंजनों, और 1 अप्रैल 2028 के बाद बनने वाले 19 kW से 56 kW कैटेगरी के इंजनों की कामकाजी स्थिति में उत्सर्जन की लाइव निगरानी की जाएगी।
यह नया नियम बेहद व्यापक है और इसमें ऑफ-रोड मशीनों में इस्तेमाल होने वाले लगभग हर तरह के आधुनिक ईंधनों को शामिल किया गया है:
ईंधनों की सूची: सीएनजी (CNG), बायो-सीएनजी, बायोगैस, एलएनजी (LNG), एलपीजी (LPG), डीजल, इथेनॉल ब्लेंड्स, फ्लेक्स-फ्यूल, बायोडीजल ब्लेंड्स, हाइड्रोजन और डुअल-फ्यूल इंजन।
HCNG को मिली रेगुलेटरी क्लेरिटी: इस नोटिफिकेशन में हाइड्रोजन-समृद्ध सीएनजी (HCNG) के लिए औपचारिक रूप से तकनीकी विनिर्देश (टेक्निकल स्पेसिफिकेशंस) निर्धारित किए गए हैं, जिससे ऑफ-रोड मशीनों में इस ईंधन के उपयोग को लेकर कानूनी स्पष्टता मिल गई है।
सरकार ने कंप्लायंस यानी नियमों के पालन को सुनिश्चित करने के लिए 'कॉन्फॉर्मिटी ऑफ प्रोडक्शन' व्यवस्था को और मजबूत किया है:
सालाना टेस्टिंग: जो कंपनियां हर साल एक इंजन फैमिली के 200 से अधिक इंजनों का उत्पादन करती हैं, उन्हें हर साल कंप्लायंस टेस्टिंग से गुजरना होगा। छोटे निर्माताओं का टेस्ट हर दो साल में एक बार होगा। टेस्टिंग के लिए सैंपल का साइज एक दिन के औसत उत्पादन पर आधारित होगा।
एडवांस टेक्नोलॉजी की जांच: इसके अलावा नियमों में इलेक्ट्रॉनिक फ्यूल इंजेक्शन और सिलेक्टिव कैटालिटिक रिडक्शन (SCR) जैसी एडवांस तकनीकों का इस्तेमाल करने वाले इंजनों के लिए एमिशन ड्यूरेबिलिटी आवश्यकताओं, कॉन्फॉर्मिटी लेबल और टेस्टिंग प्रक्रियाओं को भी निर्धारित किया गया है।
इस फैसले का भारत के कृषि और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर्स पर गहरा और दूरगामी प्रभाव पड़ेगा:
कंपनियों के लिए चुनौती: ट्रैक्टर बनाने वाली और कंस्ट्रक्शन उपकरण कंपनियों को इन मानकों को पूरा करने के लिए अपनी इंजन तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपग्रेड करना होगा।
खरीदारों को फायदा: लागू होने की तारीखों के बाद नए ट्रैक्टर या भारी मशीनें खरीदने वाले ग्राहकों को एडवांस एमिशन-कंट्रोल सिस्टम से लैस गाड़ियां मिलेंगी। ये मशीनें हानिकारक धुएं को कम करेंगी और उनकी ईंधन दक्षता में भी सुधार होगा।
स्टॉक निकालने के लिए 9 महीने की छूट: बदलाव के इस दौर में कंपनियों और डीलर्स को नुकसान न हो, इसके लिए सरकार ने तय समयसीमा से पहले बने वाहनों के लिए 9 महीने का रजिस्ट्रेशन विंडो दिया है, ताकि वे इस संक्रमण काल के दौरान अपना पुराना स्टॉक आसानी से क्लियर कर सकें।
विशेषज्ञों की राय: इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि इन नए नियमों से देश की हवा की गुणवत्ता में काफी सुधार होगा और डीजल से चलने वाली ऑफ-रोड भारी मशीनों का प्रदूषण कम होगा। यह बदलाव भारत के रेगुलेटरी ढांचे को वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य एमिशन स्टैंडर्ड्स के बेहद करीब ले जाएगा और कृषि व निर्माण क्षेत्रों में क्लीनर टेक्नोलॉजी (स्वच्छ तकनीकों) को बढ़ावा देगा।