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Energy Week 2026: डीजल को टक्कर देंगी 50,000 इलेक्ट्रिक बसें; जाने कैसे विदेशी तेल पर निर्भरता घटाएगा EV मिशन

Tue, 10 Feb 2026 07:24 PM IST
जागृति ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Commercial EV India 2026: भारत की ऊर्जा सुरक्षा अब सिर्फ रिफाइनरी क्षमता या आयात समझौतों पर निर्भर नहीं है। परिवहन विद्युतीकरण, खासकर कमर्शियल सेगमेंट में, इसे जमीनी स्तर पर मजबूत कर रहा है। हालिया उद्योग विकासों ने साफ कर दिया है कि इलेक्ट्रिक मोबिलिटी कोई पायलट प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि कमर्शियल-स्केल समाधान बन चुकी है।

 
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Energy Week 2026 - फोटो : @IndiaEnergyWeek
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विस्तार
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भारत में परिवहन विद्युतीकरण अब भविष्य की योजना नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा की मौजूदा जरूरत बन चुका है। हालिया चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर घोषणाओं के बीच, 5,259 इलेक्ट्रिक कमर्शियल वाहनों की फ्लीट ने 267 मिलियन किलोमीटर चलकर यह साबित किया है कि कमर्शियल-स्केल ईवी ऑपरेशन आज ही उत्सर्जन घटाने, लागत स्थिर करने और डीजल निर्भरता कम करने में सक्षम हैं।

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इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार लेकिन असली टेस्ट सड़क पर
देश में ईवी अपनाने को लेकर चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से तैयार हो रहा है। हाल ही में मेगा ईवी चार्जिंग हब्स के लिए एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए हैं, इंडियन ऑयल ने देशभर में 14,000 से अधिक चार्जिंग पॉइंट्स की जानकारी दी है, जबकि बीपीसीएल ने अपने 6,500 से ज्यादा फ्यूल स्टेशनों पर ईवी चार्जिंग सुविधाएं शुरू करने की घोषणा की है।  ये सभी कदम संक्रमण की दिशा में अहम संकेत हैं, लेकिन असली परीक्षा सड़कों पर होती है। इंफ्रास्ट्रक्चर तभी प्रभावी साबित होता है जब इलेक्ट्रिक वाहन रोजमर्रा के संचालन में लगातार चलें, यात्रियों को ढोएं, माल पहुंचाएं और पारंपरिक ईंधन की खपत को वास्तविक रूप से कम करें।

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 5,259 ईवी और 267 मिलियन किलोमीटर का सबूत

भारत की सबसे बड़ी कमर्शियल ईवी तैनाती में 2,561 इलेक्ट्रिक बसें और 2,698 इलेक्ट्रिक लाइट कमर्शियल वाहन (LCV) शामिल हुए हैं। इन वाहनों ने अब तक 266.98 मिलियन किलोमीटर की दूरी तय की है और हर साल 143,099 टन CO₂ (कार्बन डाई ऑक्साइड) उत्सर्जन रोका है, जो 5.72 मिलियन पेड़ लगाने के बराबर है। ये आंकड़े प्रयोग नहीं, बल्कि ऑपरेशनल रियलिटी दिखाते हैं।

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क्यों कमर्शियल वाहन गेम-चेंजर हैं
कमर्शियल वाहन कम समय में ज्यादा दूरी तय करते हैं, इसलिए उनका असर कई गुना होता है। जैसे मान लीजिए एक इलेक्ट्रिक बस सालाना 60,000 किमी चलकर 45 टन CO₂ बचाती है, तो 2,561 ई-बसें सालाना 115,904 टन CO₂ रोकती हैं, 2,698 ई-एनसीवी से 27,196 टन CO₂ की अतिरिक्त बचत है। हर इलेक्ट्रिक किलोमीटर सीधे तौर पर आयातित डीजल की खपत घटाता है।

ऑपरेटर क्यों अपना रहे हैं इलेक्ट्रिक
इंडिया एनर्जी वीक 2026 में SIAM ने भले ही मल्टी-फ्यूल अप्रोच पर जोर दिया हो, लेकिन शहरी पब्लिक ट्रांसपोर्ट और लास्ट-माइल लॉजिस्टिक्स में इलेक्ट्रिक सबसे व्यावहारिक विकल्प बन चुका है।
इससे फ्लीट ऑपरेटरों के लिए फायदे साफ हैं। जैसे कम मेंटेनेंस, स्थिर ऊर्जा लागत और 3–5 साल में बेहतर टोटल कॉस्ट ऑफ ओनरशिप (TCO)। ये फैसले पर्यावरणीय नहीं, शुद्ध व्यवसायिक हैं।

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स्केल-अप की चुनौती और जरूरत
2030 तक फ्लीट को 10 गुना बढ़ाकर 50 हजार से अधिक कमर्शियल ईवी करने का लक्ष्य रखा गया है, जिससे हर साल 1.4 मिलियन टन से ज्यादा CO₂ रोकी जा सकेगी। इसके लिए बैटरी सेल मैन्युफैक्चरिंग का लोकलाइजेशन, नीति स्थिरता, राज्य-स्तरीय खरीद आदेश और ईवी-फोकस्ड फाइनेंसिंग मॉडल जरूरी है।

एक्सपर्ट्स क्या मानते हैं?
विशेषज्ञों के अनुसार चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की घोषणाएं सही दिशा में कदम हैं, लेकिन असली बदलाव सड़कों पर होता है। जब बसें चेन्नई की गर्मी, दिल्ली की सर्दी और मुंबई के ट्रैफिक में रोज चलती हैं, तभी ऊर्जा संक्रमण सफल होता है। भारत के कमर्शियल ईवी अब साबित कर चुके हैं कि ऊर्जा स्वतंत्रता घोषणाओं से नहीं, परिचालन से आती है।

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