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EV: भारत में ईवी की रफ्तार तेज; पर ऊंची ब्याज दर बनी बाधा, 2030 तक चाहिए ₹12.5 लाख करोड़ का निवेश

Wed, 25 Feb 2026 08:56 PM IST
सुयश पांडेय ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

India EV investment 2030: अमेरिकी संस्था IEEFA की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारत को 2030 तक अपने ईवी लक्ष्यों को पूरा करने के लिए करीब ₹12.5 लाख करोड़ के बड़े निवेश की जरूरत होगी। हालांकि 2020 से 2025 के बीच इस सेक्टर में सिर्फ ₹2.23 लाख करोड़ ही जुटाए जा सके हैं। ये कुल जरूरत का महज 18% है। यानी अभी भी भारी निवेश की कमी बनी हुई है।

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इलेक्ट्रिक व्हीकल (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : iStock
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विस्तार
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भारत में इलेक्ट्रिक व्हीकल (ईवी) सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन 2030 के लक्ष्य को हासिल करने के लिए अभी भी बहुत बड़ा निवेश जरूरी है। इस पर अमेरिकी संस्था ऊर्जा अर्थशास्त्र और वित्तीय विश्लेषण संस्थान (IEEFA) ने एक रिपोर्ट जारी की है। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक ईवी मैन्युफैक्चरिंग और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाने के लिए करीब ₹12.5 लाख करोड़ की जरूरत होगी। हालांकि 2020 से 2025 के बीच इस सेक्टर में ₹2.23 लाख करोड़ का निवेश हुआ है। यह कुल जरूरत का सिर्फ 18% है। यानी अभी भी लगभग ₹10.3 लाख करोड़ का बड़ा निवेश अंतर बाकी है।

पांच साल में अच्छी रही शुरुआत लेकिन लक्ष्य अभी भी दूर

IEEFA के अनुसार, पांच साल में ₹2.23 लाख करोड़ जुटाना बड़ी उपलब्धि है। लेकिन 2030 के लक्ष्य को देखते हुए यह पर्याप्त नहीं है। निवेश का बड़ा हिस्सा कंपनियों की अपनी कमाई से आया है। इसके बाद कर्ज और इक्विटी का स्थान रहा।

तीन-पहिया ईवी में हुआ सबसे ज्यादा निवेश

भारत में 2020 से 2025 के बीच सबसे ज्यादा निवेश इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर्स में हुआ। मुख्य तौर पर इसकी वजहें ये रहीं:

  • यह सेगमेंट पहले से ही काफी विकसित है
  • कमर्शियल इस्तेमाल ज्यादा है
  • बड़ी संख्या में कंपनियां (OEM) मौजूद हैं

हालांकि 2024 और 2025 में रुझान इलेक्ट्रिक कारों की ओर बढ़ता दिख रहा है क्योंकि अब लोगों की दिलचस्पी इलेक्ट्रिक कारों में तेजी से बढ़ रही है।

ऊंची ब्याज दरें बनीं बड़ी समस्या

रिपोर्ट के मुताबिक कमर्शियल ईवी लोन पर 15% से 33% तक ब्याज लिया जा रहा है। इतनी ज्यादा ब्याज दर से ईवी खरीदने का फायदा कम हो जाता है। बढ़ी हुई ब्याज दर के कारण:

  • ईवी की मांग घटती है
  • फ्लीट विस्तार में देरी होती है
  • मैन्युफैक्चरिंग की रफ्तार धीमी पड़ती है

IEEFA का कहना है कि असली समस्या पैसों की कमी नहीं बल्कि जोखिम को लेकर अनिश्चितता की है। बैटरी की परफॉर्मेंस, रीसेल वैल्यू और कमाई को लेकर बैंकों को भरोसा नहीं होता इसलिए वे ज्यादा ब्याज लेते हैं।

चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में भी बड़ी कमी

2030 के लक्ष्य को पाने के लिए सिर्फ चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में ही करीब ₹20,600 करोड़ का निवेश चाहिए। लेकिन 2020-2025 के दौरान इस क्षेत्र में जो निवेश हुआ, वो कुल जरूरत का केवल 9.6% है। यानी चार्जिंग नेटवर्क अभी भी काफी पीछे है।

2030 तक भारत के ईवी लक्ष्य

भारत ने 2030 तक ईवी बिक्री के लिए बड़े लक्ष्य तय किए हैं:

  • 30% निजी कारें इलेक्ट्रिक
  • 70% कमर्शियल वाहन इलेक्ट्रिक
  • 40% बसें इलेक्ट्रिक
  • 80% दोपहिया और तिपहिया वाहन इलेक्ट्रिक

इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए बड़े स्तर पर फैक्ट्रियां, चार्जिंग स्टेशन और सपोर्ट सिस्टम विकसित करना होगा।

समाधान क्या हो सकता है?

IEEFA का सुझाव है कि सिर्फ सब्सिडी देना काफी नहीं है। सरकार और वित्तीय संस्थानों को जोखिम साझा करने वाले मॉडल अपनाने होंगे। उदाहरण के लिए:

  • क्रेडिट गारंटी
  • रेजिडुअल वैल्यू प्रोटेक्शन
  • बैटरी लीजिंग मॉडल

अगर ये उपाय लागू होते हैं तो ईवी लोन की ब्याज दर 8% से 12% तक लाई जा सकती है। इससे गाड़ियां सस्ती होंगी और लोग तेजी से ईवी अपनाएंगे।

इसके क्या हैं मायनें?

भारत का ईवी सेक्टर तेजी से आगे बढ़ रहा है लेकिन 2030 के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। सबसे बड़ी चुनौती नीतियां नहीं बल्कि सस्ती और भरोसेमंद फाइनेंस व्यवस्था तैयार करना है। अगर समय रहते निवेश की कमी पूरी कर ली गई तो भारत वैश्विक ईवी बाजार में मजबूत स्थान बना सकता है।

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