Old Vehicles: नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट ने भारत के सामने खड़ी एक गंभीर लेकिन अनदेखी समस्या को उजागर किया है, सड़कों पर बढ़ती पुरानी और खटारा गाड़ियां। रिपोर्ट के अनुसार, अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो 2030 तक देश में लगभग 5 करोड़ ऐसी गाड़ियां होंगी जो न सिर्फ चलने के लिए असुरक्षित होंगी बल्कि अत्यधिक प्रदूषण भी फैलाएंगी।
भारत वर्तमान में एक गंभीर लेकिन अक्सर अनदेखी की जाने वाली समस्या की दहलीज पर खड़ा है, सड़कों पर दौड़ती पुरानी और खटारा गाड़ियां। नीति आयोग की जनवरी 2026 की ताजा रिपोर्ट इस ओर इशारा करती है कि अगर हमने समय रहते कड़े कदम नहीं उठाए, तो साल 2030 तक देश में लगभग 5 करोड़ ऐसी गाड़ियां होंगी जो तकनीकी रूप से चलने लायक नहीं रहेंगी। इन वाहनों को 'एंड-ऑफ-लाइफ' (ELV) की श्रेणी में रखा जाता है। ये मुख्य रूप से ऐसे वाहन हैं जो न केवल अपनी 15 साल की निर्धारित उम्र पूरी कर चुके हैं, बल्कि अब सड़क पर चलाने के लिए सुरक्षित भी नहीं रह गए हैं। सरकारी मानकों पर खरा न उतरने के कारण ये गाड़ियां अत्यधिक प्रदूषण फैलाती हैं, जो हमारे पर्यावरण और सुरक्षा दोनों के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुकी हैं।
भारत में हर साल 2 करोड़ से ज्यादा नई कारें, बाइक और ट्रक सड़कों पर आ रहे हैं। नई गाड़ियों की इस भीड़ के साथ-साथ पुरानी और बेकार हो चुकी गाड़ियों की संख्या भी बहुत तेजी से बढ़ रही है। इसे ऐसे समझें कि 2020 में जहां हमारे पास 1 करोड़ पुरानी गाड़ियां थीं, वहीं 2025 के खत्म होते-होते यह संख्या बढ़कर 2.3 करोड़ हो सकती है। अगर यही रफ्तार बनी रही, तो 2030 तक हमारे पास ऐसी 5 करोड़ गाड़ियां होंगी जो चलने लायक नहीं रहेंगी।
पुरानी गाड़ियां नए वाहनों के मुकाबले कहीं ज्यादा धुआं और प्रदूषण फैलाती हैं, जो हमारी सेहत और हवा के लिए बहुत खतरनाक है। रिपोर्ट बताती है कि जो गाड़ियां नए नियमों (BS-VI) के आने से पहले बनी थीं, वे नई गाड़ियों की तुलना में 8 गुना ज्यादा प्रदूषण फैलाती हैं। सीधे शब्दों में कहें तो, सड़क पर चल रही एक अकेली पुरानी गाड़ी उतनी ही गंदगी फैलाती है जितनी कई सारी नई गाड़ियां मिलकर भी नहीं फैलातीं।
भारत में पुरानी गाड़ियों को कबाड़ में काटने (स्क्रैपिंग) का ज्यादातर काम गली-मोहल्ले के कबाड़ियों द्वारा किया जाता है। यहां न तो सुरक्षा का ध्यान रखा जाता है और न ही पर्यावरण का। गाड़ियों से निकलने वाली बैटरी, तेल और जहरीले पदार्थों को बड़ी लापरवाही से फेंक दिया जाता है, जो जमीन और हवा को नुकसान पहुंचाते हैं।
रिपोर्ट यह बताती है कि गाड़ियों की जांच और उन्हें कबाड़ करने की सुविधाओं के बीच अभी एक बड़ा अंतर है। सितंबर 2025 तक 16 राज्यों में सिर्फ 156 सरकारी टेस्टिंग स्टेशन (ATS) ही खुले थे, जबकि गाड़ियों की भारी संख्या को देखते हुए 2027 तक भारत को करीब 500 स्टेशनों की जरूरत होगी।
दूसरी ओर, सरकार ने पुरानी गाड़ियों को नष्ट करने के लिए आधुनिक सेंटर तो खोल दिए हैं, लेकिन गाड़ी मालिक वहां अपनी गाड़ियां लेकर नहीं जा रहे हैं। इस वजह से ये सेंटर खाली पड़े हैं और अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहे हैं।
पुरानी गाड़ियां सिर्फ कूड़ा-कचरा नहीं हैं, बल्कि वे कीमती सामान का खजाना हैं। अगर साल 2005 से 2023 के बीच बनी गाड़ियों को सही तरीके से रीसायकल (दोबारा इस्तेमाल) किया जाए, तो उनसे करीब 9.8 करोड़ टन स्टील मिल सकता है। सबसे अच्छी बात यह है कि इस स्टील का दोबारा इस्तेमाल करने से पर्यावरण को बहुत फायदा होगा और हवा में घुलने वाली जहरीली गैस (CO₂) में करीब 4.3 करोड़ टन की कमी आएगी।