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Hybrid Cars: भारतीय यात्री कार बाजार में हाइब्रिड की थमी रफ्तार, ईवी और सीएनजी कारों की बिक्री में तेजी

Tue, 16 Dec 2025 02:35 PM IST
अमर शर्मा ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

शुरुआत में बढ़ती दिलचस्पी दिखने के बाद, हाइब्रिड टेक्नोलॉजी वाली कारें भारत में तेजी से अपनी लोकप्रियता खोती नजर आ रही हैं। जानें क्या हो सकती हैं इसकी वजहें...
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Maruti Suzuki Grand Vitara - फोटो : Maruti Suzuki
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विस्तार
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भारत के पैसेंजर कार (यात्री कार) बाजार में हाइब्रिड तकनीक की शुरुआती लोकप्रियता अब तेजी से फीकी पड़ती दिख रही है। जिस तकनीक को कुछ समय पहले तक इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने की ओर का पुल माना जा रहा था, वही अब ग्राहकों और वाहन निर्माताओं दोनों की प्राथमिकताओं से बाहर होती जा रही है। इसकी जगह इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) और सीएनजी कारें लगातार मजबूत पकड़ बना रही हैं। जिससे हाइब्रिड गाड़ियों की बाजार हिस्सेदारी में तेज गिरावट दर्ज की जा रही है।
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24 महीने के निचले स्तर पर पहुंची हाइब्रिड की हिस्सेदारी
फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (FADA) (फाडा) के वास्तविक वाहन पंजीकरण आंकड़ों के अनुसार, नवंबर में हाइब्रिड कारों की मासिक बाजार हिस्सेदारी घटकर 4.61 प्रतिशत रह गई। यह बीते 24 महीनों का सबसे निचला स्तर है और पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले लगभग आधी है। इसके उलट, इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी इसी अवधि में लगभग दोगुनी हो गई है। जो बाजार में बदलते रुझानों की साफ तस्वीर पेश करती है।

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इलेक्ट्रिक वाहनों को मिल रहा मजबूत समर्थन
सितंबर 2025 में ईवी की हिस्सेदारी यात्री वाहन बाजार में 5 प्रतिशत से थोड़ा अधिक रही, जबकि अक्तूबर 2024 में यह केवल 2.29 प्रतिशत थी। चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार, प्रतिस्पर्धी कीमतें और अनुकूल टैक्स नीतियां इलेक्ट्रिक वाहनों को तेजी से मुख्यधारा में ला रही हैं। यही वजह है कि ग्राहक अब हाइब्रिड के बजाय सीधे इलेक्ट्रिक विकल्प की ओर झुक रहे हैं।

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CNG बना दूसरा सबसे बड़ा सेगमेंट
सीएनजी वाहन इस बदलाव के सबसे बड़े विजेता बनकर उभरे हैं। आज भारत में बिकने वाली हर पांच में से एक यात्री कार सीएनजी पर चलती है। जिससे यह सेगमेंट बाजार में दूसरा सबसे बड़ा बन गया है। कम रनिंग कॉस्ट और अपेक्षाकृत कम उत्सर्जन के चलते सीएनजी ने डीजल की जगह ले ली है। खासकर उन ग्राहकों के लिए जो वाहन का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं।

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सीमित मॉडल रेंज से जूझ रहा हाइब्रिड सेगमेंट
भारत में हाइब्रिड कारों का विकल्प अभी भी सीमित है। मारुति सुजुकी ग्रैंड विटारा, इनविक्टो और हाल में लॉन्च की गई विक्टोरिस बेचती है। जबकि उसकी साझेदार टोयोटा हाइराइडर, हाइक्रॉस, वेलफायर और कैमरी के हाइब्रिड वर्जन पेश करती है। होंडा के पास इस सेगमेंट में केवल सिटी e-HEV ही उपलब्ध है। सीमित विकल्पों की वजह से भी हाइब्रिड तकनीक बड़े पैमाने पर ग्राहकों को आकर्षित नहीं कर पा रही है।

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टैक्स स्ट्रक्चर बना सबसे बड़ी बाधा
हाइब्रिड कारों की सबसे बड़ी कमजोरी उनकी कीमत है। फिलहाल इन पर 40 प्रतिशत जीएसटी लगता है, जबकि इलेक्ट्रिक वाहनों पर केवल 5 प्रतिशत टैक्स है। हालांकि यह दर जीएसटी से पहले के 43-48 प्रतिशत टैक्स से कम जरूर है, लेकिन अन्य आईसी इंजन वाहनों की तुलना में इसमें अपेक्षित राहत नहीं दी गई। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों द्वारा हाइब्रिड पर रोड टैक्स छूट वापस लेने से भी मांग पर नकारात्मक असर पड़ा है।

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शोरूम में साफ दिखता है कीमत का फर्क
कीमत का अंतर शोरूम स्तर पर भी साफ नजर आता है। एंट्री-लेवल विक्टोरिस हाइब्रिड की एक्स-शोरूम कीमत 16.38 लाख रुपये है। जबकि पूरी तरह इलेक्ट्रिक विनफास्ट VF6 की कीमत 16.49 लाख रुपये है। लेकिन रोड टैक्स और अन्य शुल्क जुड़ने के बाद हाइब्रिड कार ईवी से महंगी पड़ती है। जिससे ग्राहक इलेक्ट्रिक विकल्प को ज्यादा व्यवहारिक मान रहे हैं।

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नीति मतभेदों ने भी घटाई हाइब्रिड की चमक
नीति स्तर पर भी हाइब्रिड को लेकर मतभेद बने हुए हैं। मारुति सुजुकी, टोयोटा और होंडा जीएसटी को 5 प्रतिशत तक घटाने की मांग कर रहे हैं, ताकि हाइब्रिड को ईवी के बराबर लाया जा सके। वहीं टाटा मोटर्स और महिंद्रा एंड महिंद्रा जैसी घरेलू कंपनियां, जो पूरी तरह ईवी प्लेटफॉर्म पर निवेश कर चुकी हैं, इसका विरोध कर रही हैं। उनका तर्क है कि सबसे कम टैक्स प्रोत्साहन केवल शून्य-उत्सर्जन वाहनों को ही मिलना चाहिए।

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CAFE मानकों की मजबूरी और EV की ओर झुकाव
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, एक प्रमुख कार निर्माता के वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि, हाइब्रिड तकनीक मूल रूप से एक अस्थायी समाधान है, जिसका इस्तेमाल कंपनियां CAFE (कैफे) मानकों को पूरा करने के लिए करती हैं। ये मानक औसत ईंधन दक्षता और CO₂ उत्सर्जन घटाने के लिए बनाए गए हैं। ईवी पोर्टफोलियो के बिना इन नियमों का पालन करना आने वाले समय में और मुश्किल होगा।

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भविष्य EV का, हाइब्रिड पीछे छूटते दिखे
मारुति सुजुकी और टोयोटा अभी तक भारत में अपनी पहली ईवी को व्यावसायिक रूप से लॉन्च नहीं कर पाई हैं। मारुति की ई-विटारा की डिलीवरी जल्द शुरू होने की उम्मीद है। जबकि टोयोटा 2026 में अपना संस्करण ला सकती है। अप्रैल 2027 से लागू होने वाले कड़े CAFE 3 मानकों के बीच ईवी की ओर झुकाव और तेज होगा।

ईवी और सीएनजी वाहनों की बढ़ती हिस्सेदारी और नीतिगत समर्थन को देखते हुए इस बात पर चर्चा तेज हो चली है कि, क्या भारत के बदलते ऑटोमोबाइल परिदृश्य में हाइब्रिड तकनीक अपेक्षा से कहीं तेजी से अपनी प्रासंगिकता खो रही हैं? 

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