भारत सरकार के भारी उद्योग मंत्रालय (एमएचआई) द्वारा गठित एक उच्च-स्तरीय सरकारी पैनल ने पाया है कि वाहन कंपनियों ने जानबूझकर फास्टर एडॉप्शन एंड मैन्युफैक्चरिंग ऑफ इलेक्ट्रिक एंड हाइब्रिड व्हीकल्स इन इंडिया (फेम-2) (FAME-2) के दिशानिर्देशों का उल्लंघन किया। जबकि ये नियम स्पष्ट थे। पैनल ने कथित तौर पर मई 2024 की शुरुआत में अपने निष्कर्ष पेश किए। एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यह रिपोर्ट एमएचआई के एक संयुक्त सचिव द्वारा पहले की गई जांच के निष्कर्षों का खंडन करती है। जिसमें कहा गया था कि फेम योजना में कुछ प्रमुख शब्दों को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया था।
यह पैनल फेम-2 योजना घोटाले की जांच के लिए अतिरिक्त सचिव द्वारा गठित किया गया था। यह घटना ऐसे समय में हुई है जब, कई महीने पहले ही एमएचआई ने 13 इलेक्ट्रिक वाहन निर्माताओं को फेम-2 योजना के तहत अनुचित तरीके से दावा की गई सब्सिडी की राशि वापस करने का निर्देश दिया था।
इन इलेक्ट्रिक वाहन निर्माताओं में हीरो इलेक्ट्रिक, ओकिनावा ऑटोटेक, एम्पीयर व्हीकल्स, बेनलिंग इंडिया, रिवोल्ट इंटेलीकॉर्प और एमो मोबिलिटी सहित छह प्रमुख ब्रांड शामिल थे। जिन्हें आयातित उत्पादों का इस्तेमाल करने और सब्सिडी का फायदा लेने का दोषी पाया गया था। जो चरणबद्ध विनिर्माण (फेज्ड मैन्युफेक्चरिंग) दिशानिर्देशों का उल्लंघन था। इसकी वजह से, इन कंपनियों को लगभग 469 करोड़ रुपये चुकाने के लिए कहा गया है।
रिपोर्ट में एक सरकारी अधिकारी के हवाले से कहा गया है कि समिति कुछ समय से इस मामले की जांच कर रही है। अधिकारी ने कथित तौर पर कहा है कि सभी अधिसूचनाओं और दिशानिर्देशों, संबंधित परीक्षण एजेंसियों और साथ ही एमएचआई के ऑटो सेक्शन के अधिकारियों की जांच के बाद पेश की गई रिपोर्ट के पहले भाग के अनुसार, यह निष्कर्ष निकाला गया है कि योजना अधिसूचना और दिशानिर्देश स्पष्ट थे और सभी संबंधित हितधारकों, परीक्षण एजेंसियों, वाहन निर्माता कंपनियों और एमएचआई द्वारा अच्छी तरह से समझा गया था।
पैनल ने कथित तौर पर कहा है कि स्थानीयकरण जरूरत के मुद्दे पर, स्थानीयकरण के लिए समयसीमा उद्योग के सभी हितधारकों, जिनमें उद्योग जगत के खिलाड़ी और परीक्षण एजेंसियां भी शामिल हैं, के साथ उचित परामर्श के बाद निर्धारित की गई थी।
एमएचआई ने अप्रैल 2023 में फेम योजना के तहत सब्सिडी उल्लंघन के मामलों की जांच के लिए एक जांच शुरू की थी। ताकि प्रक्रियागत चूक और सरकारी अधिकारियों की भूमिका की जांच की जा सके। जिसकी वजह से सब्सिडी राशि गलत तरीके से इलेक्ट्रिक वाहन निर्माताओं को बांटी गई।