वाहन कंपनियों की चिंता क्यों बढ़ी
बड़ी ऑटो कंपनियों का मानना है कि ईवी रेट्रोफिटिंग को सीएनजी या एलपीजी किट जैसी आसान तकनीकी प्रक्रिया नहीं माना जा सकता। उद्योग से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, इलेक्ट्रिक वाहनों में बैटरी की प्लेसमेंट, वजन संतुलन, सॉफ्टवेयर इंटीग्रेशन और ड्राइविंग परफॉर्मेंस पूरी तरह बदल जाती है।
उनका कहना है कि यह बदलाव केवल प्लेटफॉर्म-लेवल इंजीनियरिंग से संभव है। जिसे पुराने वाहनों में रेट्रोफिटिंग के जरिए सुरक्षित रूप से लागू करना मुश्किल है।
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सुरक्षा और तकनीकी जोखिम पर सवाल
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, ऑटो सेक्टर के विशेषज्ञों का कहना है कि ईवी में बैटरी इंटीग्रेशन, सॉफ्टवेयर कंट्रोल, रेंज और सेफ्टी सबसे अहम पहलू होते हैं। रेट्रोफिट किए गए वाहन में इन सभी चीजों को पूरी तरह अनुकूलित करना संभव नहीं होता।
अधिकांश कार निर्माता पहले ही 'बॉर्न-इलेक्ट्रिक' प्लेटफॉर्म पर भारी निवेश कर चुके हैं, जो खासतौर पर ईवी के लिए डिजाइन किए गए हैं। ऐसे में पुराने वाहनों को इलेक्ट्रिक में बदलना न तो बड़े पैमाने पर व्यावहारिक है और न ही मौजूदा सुरक्षा मानकों के अनुरूप।
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कुछ कंपनियों को दिख रहा है अवसर
बड़ी कंपनियों की आपत्तियों के बावजूद कुछ रेट्रोफिटिंग कंपनियां इस सेक्टर में संभावनाएं देख रही हैं। उनका तर्क है कि दिल्ली में 15 साल से पुराने पेट्रोल और 10 साल से पुराने डीजल वाहनों पर प्रतिबंध है। ईवी रेट्रोफिटिंग से ऐसे वाहन फिर से सड़कों पर चल सकते हैं, वो भी बिना टेलपाइप उत्सर्जन के।
रेट्रोफिटिंग करने वालों का कहना है कि इससे दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में से एक दिल्ली में प्रदूषण कम करने में मदद मिल सकती है।
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नीति और टैक्स ढांचे की बड़ी बाधा
रेट्रोफिटिंग कंपनियों का कहना है कि भारत में ईवी रेट्रोफिटिंग को अब तक अलग उत्पाद श्रेणी के रूप में मान्यता नहीं मिली है। न तो स्पष्ट जीएसटी ढांचा है और न ही आसान नियामक प्रक्रिया।
एक ओर जहां नए इलेक्ट्रिक वाहनों पर 5 प्रतिशत जीएसटी लगता है, वहीं रेट्रोफिट किए गए ईवी पर 18 प्रतिशत टैक्स लिया जाता है। जिससे यह प्रक्रिया आर्थिक रूप से महंगी और अव्यावहारिक हो जाती है।
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राज्यों में सीमित प्रोत्साहन, केंद्र से उम्मीद
दिल्ली, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और तेलंगाना जैसे कुछ राज्यों ने सीमित स्तर पर रेट्रोफिटिंग को प्रोत्साहन देना शुरू किया है। हालांकि, केंद्र सरकार का फोकस अभी भी बीएस मानकों वाले नए वाहनों के जरिए उत्सर्जन कम करने पर है, न कि रेट्रोफिटिंग को बढ़ावा देने पर।
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इंडस्ट्री की सरकार से मांगें
ईवी रेट्रोफिटिंग को व्यवहारिक बनाने के लिए उद्योग जगत ने कई मांगें रखी हैं, जिनमें शामिल हैं-
- रेट्रोफिटिंग वाले ईवी पर जीएसटी कम किया जाए
- स्क्रैपेज पॉलिसी से जुड़ी सब्सिडी दी जाए
- रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया सरल बनाई जाए
- टाइप अप्रूवल सर्टिफिकेट की वैधता 3 साल से बढ़ाकर 5 साल की जाए
- रेट्रोफिट किए गए वाहनों को अतिरिक्त 10 साल की रजिस्ट्रेशन अवधि दी जाए
ऑटो उद्योग मानता है कि जब तक स्पष्ट नीति और सुरक्षा ढांचा तैयार नहीं होता। तब तक ईवी रेट्रोफिटिंग एक विवादित और सीमित समाधान ही बनी रहेगी।
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