केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने रविवार को पुणे में देश की पहली पूर्ण स्वदेशी हाइड्रोजन फ्यूल सेल से चालित बस को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। ऊर्जा तकनीकी के क्षेत्र में यह बेहद महत्त्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, क्योंकि यदि यह कार्यक्रम सफल रहता है, तो इससे न केवल भारत के ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने की राह खुलेगी, बल्कि भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा जो ऊर्जा के संदर्भ में आत्मनिर्भर हैं। भारत फॉसिल फ्यूल्स को छोड़कर पूर्ण हरित ऊर्जा क्षेत्र अपनाने की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है और योजना है कि देश 2070 तक शून्य कार्बन उत्सर्जन लक्ष्य को हासिल कर ले। यह योजना इस लक्ष्य को हासिल करने में बड़ा कदम साबित हो सकती है।
ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा ने अमर उजाला को बताया कि हाइड्रोजन को ईंधन के तौर पर इस्तेमाल करने की तकनीकी बहुत मुश्किल नहीं है, भारत में पानी और हवा से हाइड्रोजन को प्राप्त कर उसे ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने की कई योजनाओं पर काम चल रहा है। पुणे का केपीआईटी-सीएसआईआर सहयोग कार्यक्रम इन्हीं में से एक है। लेकिन अभी यह पायलट प्रोजेक्ट के रूप में ही चलाया जा रहा है। व्यावसायिक स्तर पर इसे लोगों के बीच उपलब्ध होने में चार से सात साल का समय लग सकता है जिसे इसका उपयोग देखते हुए बहुत ज्यादा नहीं कहा जा सकता।
देश अपनी कुल ऊर्जा जरूरतों का लगभग 86 फीसदी तेल, 54 फीसदी गैस, 85 फीसदी सौर ऊर्जा उपकरण और काफी मात्रा में कोयला आयात करता है। इसमें देश को भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च करनी प़ड़ती है। यदि भारत अपने यहां हाइड्रोजन फ्यूल सेल, सौर ऊर्जा उपकरण और इसके निर्माण की तकनीकी विकसित कर लेता है तो यह न केवल भारत को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना सकता है, बल्कि इससे भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा की बचत होगी जो देश की कल्याणकारी योजनाओं, वैज्ञानिक और रक्षा अनुसंधान में खर्च की जा सकती है। यह कई क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर खोलेगा जो हमारी युवा आबादी को नए विकल्प दे सकता है, इसलिए हाइड्रोजन फ्यूल सेल को भारत के विकास की कुंजी भी कहा जा सकता है।