2018 के आंकड़ों के मुताबिक हर साल तकरीबन 1.35 लाख लोग सड़क दुर्घटनाओं के शिकार होते हैं, जिसका असर सीधे उन परिवारों पर पड़ता है जिनके परिजन इन दुर्घटनाओं में अपनी जान गवां देते हैं। मैं एक बात बहुत विश्वास से कह सकती हूं कि जिस घर का चिराग सड़क हादसे में बुझ गया या कोई ऐसा शख्स जो आसमान छूने की तमन्ना रखता हो और वह किसी वाहन की टक्कर लगने के बाद आजीवन व्हीलचेयर पर बैठ जाए, तो इस चोट को कौन सबसे ज्यादा महसूस करेगा। ये कहना है कि लंदन से दिल्ली आकर अपने भाई का केस लड़ने वाली शिल्पा मित्तल का। शिल्पा के भाई को तीन साल पहले सिविल लाइन इलाके में सड़क पार करने के दौरान एक मर्सिडीज कार ने टक्कर मार दी थी।
कभी भी और किसी के साथ हो सकता है सड़क हादसा
सड़क सुरक्षा पर लंबे समय से काम कर रहे सेव लाइफ फाउंडेशन के सीईओ पीयूष तिवारी ने ऐसे कई पीड़ितों को मीडिया के समक्ष पेश किया, जिन्होंने सड़क हादसों में अपनों को खोया है या वे खुद इसके शिकार बने हैं। सड़क हादसे में अपने भाई को गंवा चुकी शिल्पा मित्तल बताती हैं कि मर्सडीज कार चलाने वाले की उम्र 17 साल थी और तब से हमारे घर में कोई त्योहार नहीं मना है। उन्होंने उन राजनेताओं को भी नसीहत दी है, जो ट्रैफिक जुर्माने को घटा रहे हैं। उन्होंने कहा, राजनेता इसे पर्सनल एजेंडा न मानें और इस संशोधित मोटर व्हीकल एक्ट को सख्ताई से लागू कराने में अपना सहयोग दें। वे कहती हैं कि ध्यान रखें कि सड़क हादसा कभी भी और किसी के साथ भी हो सकता है।
जुर्माना घटाने का पीड़ित कर रहे विरोध
मोटर व्हीकल संशोधन अधिनियम पास होने के बाद ट्रैफिक चालान राशि कई गुना बढ़ गई है। जिसके बाद राजनीतिक गलियारों में एक बहस छिड़ गई है। कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने एक्ट में दिए गए ट्रैफिक जुर्माने को अपनी मर्जी से कम करने की घोषणा कर दी है। वहीं जुर्माना घटाने के खिलाफ अब वे लोग सामने आ रहे हैं, जिन्होंने सड़क हादसों में अपनों को खोया है या वे खुद इसके पीड़ित हैं।
ट्रैफिक पुलिसकर्मियों से करते थे बहसबाजी
मेरे 23 वर्षीय भाई सिद्धार्थ की मौत के बाद परिवार टूट चुका है। मैंने हिम्मत नहीं हारी और तय किया कि इस हादसे के लिए जिम्मेदार आरोपी को सजा दिलाकर रहूंगी। मेरे भाई को टक्कर मारने वाला चालक नाबालिग था और उसकी उम्र 17 साल बताई गई। वह सिविल लाइन की उन सड़कों पर 100 की रफ्तार में गाड़ी चला रहा था, जहां स्पीड लिमिट मुश्किल से पचास-साठ किलोमीटर प्रति घंटा रहती है। अगर उस वक्त सड़क कानून सख्त होते तो संभव था कि आरोपी के पेरेंट्स उसे कार न चलाने देते। 1988 का एमवी एक्ट, जिसमें बहुत सामान्य जुर्माना है, वाहन चालक उसकी परवाह नहीं करते थे।
कोई उल्लंघन होने पर ट्रैफिक पुलिसकर्मी के साथ बहसबाजी करना और बाद में सौ रुपये का नोट फेंक कर चले जाना, बहुत से लोगों की फितरत बन चुकी थी। अब सख्त कानून बन गया है तो राजनेता ही उसे कमजोर करने में लगे हैं। जिससे लगता है कि वे सड़क हादसे को बहुत सामान्य रुप से लेते हैं। उन्हें चाहिए कि वे अपने राजनीतिक स्वार्थ छोड़कर कानून को सख्ताई के साथ लागू कराने में मदद करें।
लोगों को कार्टून बनाने से फुरसत नहीं
दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन कर रही व्हीलचेयर पर बैठीं प्रतिष्ठा देवेश्वर साल 2011 में अपने मां बाप के साथ रोपड़ जा रही थी। बीच में सड़क हादसा हो गया। बतौर प्रतिष्ठा, हादसे के बाद वहां लोगों का हुजूम उमड़ आया, लेकिन कोई मदद के लिए आगे नहीं बढ़ा। किसी ने पुलिस या एंबुलेंस को फोन नहीं किया और अस्पताल पहुंचने में तीन घंटे लग गए। अब आप ही बताएं कि सड़क सुरक्षा कानून सख्त क्यों न हो। एक बात तो तय है कि हमारे देश में बिना सख्त कानून के कोई भी व्यक्ति ट्रैफिक नियमों का पालन नहीं करता।
1988 के बाद अब सरकार ने जुर्माने की राशि बढ़ाई है तो इस पर राजनीति कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर तरह-तरह के कार्टून बनाए जा रहे हैं, जो वाकई शर्मनाक है। लोगों ने ट्रैफिक कानून का मजाक बनाकर रख दिया है और मुख्यमंत्री पद पर बैठे लोग इस नए कानून को कमजोर बनाने में लगे हैं।
काटते रहते हैं अस्पतालों के चक्कर
संध्या दुरंग का कहना है कि सड़क हादसे ने हमारी सारी खुशियां छीन लीं। दो साल पहले एक वाहन ने मेरे बेटे को टक्कर मार दी थी, और वह अभी तक कोमा में है। दूसरा बेटा भी नौकरी नहीं कर पा रहा है क्योंकि अस्पतालों के चक्कर काटते-काटते पूरा दिन कब बीत जाता है, पता ही नहीं चलता। अब हम और ज्यादा मेडिकल खर्च करने की स्थिति में नहीं हैं। मैं केवल इतना कहना चाहूंगी कि सभी लोग ट्रैफिक नियमों का पालन करें। एक बार हादसा होने के बाद उसके अंजामों का पता लगाना मुश्किल है। सरकार ने अब ट्रैफिक जुर्माने की राशि बढ़ाई है तो वह एक सही कदम है। राजनेताओं को इस कानून को लागू कराने के लिए आगे आना चाहिए।
कई नेताओं की सड़क हादसों में जा चुकी है जान
पीयूष तिवारी का कहना है कि पिछले दस साल में करीब 15 लाख लोगों की सड़क हादसे में जान चली गई है और एक करोड़ से अधिक लोग घायल हो चुके हैं। अप्रैल 2007 में मेरा 16 साल का भाई सड़क हादसे में मारा गया था। लेकिन हमारे देश में सड़क हादसों को कोई गंभीरता से नहीं लेता। जिसके बाद मैंने सेव लाइफ फाउंडेशन का गठन किया औरर सड़क सुरक्षा को लेकर हजारों रिपोर्ट तैयार कीं। हमारे संगठन के सुझाव पर कई नियमों को नए मोटर व्हीकल संशोधन अधिनियम में जगह दी गई।
गोपीनाथ मुंडे, राजेश पायलट और साहिब सिंह वर्मा समेत अनेक राजनेता एवं दूसरी हस्तियों की सड़क हादसों में मौत हुई है। राजनेताओं को आज सड़क सुरक्षा कानून को एक मुद्दा बनाकर उन्हें लोगों से यह अपील करनी चाहिए कि वे नए कानून का पालन करें। यह नए कानून का ही असर है कि डीएल और प्रदूषण सर्टिफिकेट बनवाने के लिए लोगों की लाइन लग रही है।
जुर्माना घटाने वाले नेता जनता के हितैषी नहीं
हैरी बताते हैं कि मैं फुटबॉल का खिलाड़ी था, लेकिन आज उठ भी नहीं पाता हूं। जेएनयू कैंपस में हुए सड़क हादसे के बाद बॉडी पेरालाइज हो गई, हर माह इलाज पर एक लाख रुपया खर्च हो रहा है। फुटबॉल का सपना तो टूट ही चुका है और परिवार हर वक्त परेशान रहता है। वह कहते हैं कि अगर हैवी पेनल्टी होती है तो लोग सड़क सुरक्षा के नियमों का पालन करते हैं। गुजरात सरकार या कोई दूसरा राज्य, यदि जुर्माने की राशि को घटा रहा है तो वह गलत कर रहा है।
मोबाइल कवर सभी रखते हैं। डाटा केबल या चार्जर का जुगाड़ भी करते हैं। यही लोग डीएल, प्रदूषण सर्टिफिकेट या हेलमेट नहीं रखना चाहते। हमारे देश में जो स्थिति है, उसमें लोग बिना भारी जुर्माने के नहीं मानते हैं। यदि कोई राजनेता इस मामले में राजनीति कर रहा है, तो वह जनता का हितैषी कभी नहीं हो सकता और लोगों की जान नहीं बचाना चाहता।