FASTag (फास्टैग) का इस्तेमाल किसी नागरिक के आवाजाही के मौलिक अधिकार का हनन नहीं करेगा। केंद्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट में हलफनामा देकर यह जानकारी दी है। केंद्र सरकार ने अदालत में दायर एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त देते हुए पिछले सप्ताह एक हलफनामा जमा किया है।
रिपोर्ट के मुताबिक पीआईएल ने कथित तौर पर इलेक्ट्रॉनिक टोल संग्रह के लिए सभी वाहनों के लिए फास्टैग को अनिवार्य बनाने के फैसले को चुनौती दी थी। इसने उन वाहनों पर जुर्माना लगाने के फैसले पर भी सवाल उठाए, जिन पर फास्टैग नहीं लगा है।
केंद्र ने अपने जवाब में बताया कि फास्टैग को अनिवार्य बनाने के पीछे सोच यह है कि देश भर के टोल प्लाजा पर यातायात के सुचारू प्रवाह को सुनिश्चित किया जा सके। जवाब में कहा गया है कि इलेक्ट्रॉनिक भुगतान टोल-भुगतान बूथों पर लगी लंबी कतारों को कम कर के यात्रा के समय को कम करेगा। केंद्र के हलफनामे में कहा गया, "फास्टैग का इस्तेमाल करने का आदेश नागरिकों के आवजादी की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन नहीं करता है।"
गौरतलब है कि फास्टैग को लेकर कई तरह की चिंताएं सामने आई हैं। इनमें किसी को नागरिकों की आवाजाही के अधिकार में बाधा डालने का अंदेशा है तो कुछ ने निगरानी की संभावना का भी संदेह जताया है। लेकिन सरकार ने कहा है कि यह न सिर्फ भुगतान करने का एक सुरक्षित तरीका है बल्कि फास्टैग के इस्तेमाल से ईंधन की बचत होगी।
सरकार ने इस साल की शुरुआत से फास्टैग के इस्तेमाल को अनिवार्य कर दिया है। सरकार के आदेश के तहत सभी वाहनों में फ्रंट स्क्रीन पर फास्टैग लगाना जरूरी है। लेकिन यदि किसी वाहन पर फास्टैग नहीं लगा है, तो उसे टोल प्लाजा में सबसे बाएं लेन का इस्तेमाल करना चाहिए और टोल बूथ पार करने के लिए नकदी में दोगुना भुगतान करना होगा।
फास्टैग एक RFID स्टिकर है जो डिजिटल रूप से स्कैन किया जाता है और इसके जरिए इलेक्ट्रॉनिक तरीके से भुगतान किया जाता है। वाहन के बूम बैरियर के करीब आने पर फास्टैग को स्कैन किया जाता है।