रात 01:40 बजे विक्रम लैंडर चांद की धरती से 35 किमी की ऊंचाई पर लगभग 6,000 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से नीचे उतरना शुरू करेगा। मात्र 10 मिनट में ही विक्रम लैंडर 7.4 किमी की ऊंचाई तक पहुंच जाएगा और इसकी गति घट कर लगभग 526 किमी प्रति घंटा हो जाएगी। अगले 38 सेकेंड में विक्रम की स्पीड घट कर 331.2 किमी प्रति घंटा हो जाएगी और यह पांच किमी की ऊंचार पर पहुंच जाएगा।
अगले डेढ़ मिनट में विक्रम लैंडर चांद की धरती से 400 मीटर ऊपर होगा और रफ्तार घट कर 100 किमी प्रति घंटा तक पहुंच जाएगी। लेकिन जैसे ही विक्रम सतह से 400 मीटर ऊपर होगा तो यह गति के साथ नीचे गिरना बंद कर देगा और 12 सेकेंड तक हवा में मंडरायेगा और सेंसर्स के जरिये कुछ आंकड़े एकत्र करेगा। अगले 66 सेकेंड में यह सतह से 100 मीटर ऊपर होगा और पहले से ही तय लैंडिंग साइट तक पहुंचने के लिए 25 सेकेंड का वक्त लेगा और हवा में मंडराने के दौरान लैंडर उतरने के लिए जरूरी डाटा एकत्र करेगा।
अगर विक्रम लैंडर उतरने के लिए पहली जगह चुनता है, तो लैंडर 65 सेकेंड में 10 मीटर की ऊंचाई तक पहुंच जाएगा, और इसकी रफ्तार काफी कम हो जाएगी। जिसमें यह वर्टिकल तरीके से लैंडिंग करेगा। वहीं अगर यह लैंडिंग के लिए दूसरी साइट चुनता है तो सतह से 60 मीटर ऊपर तक पहुंचने में 40 सेकेंड लेगा और अगले 25 सेकेंड में 10 मीटर नीचे आएगा। 10 मीटर की ऊंचाई से सतह तक पहुंचने में 13 सेकेंड का वक्त लेगा और रफ्तार 0 किमी होगा।
लैंडिंग के 15 मिनट बाद विक्रम पहली फोटोग्राफ्स भेजेगा। लैंडिंग के चार घंटे बाद 27 किलो वजह वाला प्रज्ञान रोवर विक्रम लैंडर से बाहर निकलेगा। ऑर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस प्रज्ञान रोवर में छह रोबोटिक पहिये हैं। यह करीब 500 मीटर तक सफर कर सकता है। यह एक सेंटीमीटर चलने में एक सेकेंड का वक्त लेगा। इसके फ्रंट में एक मैगापिक्सल के दो मोनोक्रोमेटिक नैवकैम लगे होंगे। नीचे इसरो स्टेशन में बैठे वैज्ञानिकों को आसपास की जगह का 3डी व्यू देगा। आईआईटी कानपुर ने इसके लिए खास लाइट बेस्ड मैप जेनरेशन सिस्टम डेवलप किया है।
इसमें रॉकर बोगी सस्पेंशन सिस्टम लगा होगा और प्रत्येक पहिये में ब्रशलेस डीसी इलेक्ट्रिक मोटर लगी होगी। वहीं इसकी लंबाई 3 फीट, चौड़ाई 2.5 फीट और ऊंचाई 2.8 फीट होगी। काम करने के लिए प्रज्ञान सोलर ऊर्जा का इस्तेमाल करेगा। यह सिर्फ लैंडर विक्रम से संपर्क स्थापित कर सकता है। यह सतह में मौजूद पानी या बाकी तत्वों का बारीकी से परीक्षण करेगा।
प्रज्ञान में दो खास यंत्र लगे होंगे। इसमें पहला खास यंत्र है अल्फा पार्टिकल एक्सरे स्पेक्ट्रोमीटर (APXS)। एपीएक्सएस को अहमदाबाद की फिजिकल रिसर्च लैब में बनाया गया है, जिसका मकसद है लैंडिंग साइट के आसपास यौगिक तत्वों की खोज करना। चांद की सतह पर अल्फा तत्वों की बमबारी होती रहती है। यह यंत्र सोडियम, मैग्निशियम, एल्यूमीनियम, सिलिका, कैल्शियम, टाइटेनियम, स्ट्रॉन्टियम, यॉट्रियम, जिरकॉनियम और आयरन जैसे तत्वों की मौजूदगी का पता चलेगा। यह सोलर एनर्जी के जरिये 50 वॉट तक की बिजली पैदा कर सकता है। वहीं यह चांद पर 14 दिन यानी चांद का एक दिन वहां गुजारेगा।
वहीं प्रज्ञान में दूसरा खास यंत्र होगा लेजर इंडयूज्ड ब्रेकडाउन स्पेक्ट्रोस्कोप (LIBS)। इसे बंगलुरू की लैबोरेट्रो ऑफ इलेक्ट्रो ऑप्टिक सिस्टम में बनाया गया है। इसका मकसद लैंडिंग साइट के आसपास भारी मात्रा में मौजूद तत्वों का पता लगाना है। यह हाई पावर लेजर छोड़ कर रेडियेशन के जरिये यह पता लगाता है कि वहां किस चीज का भंडार है।