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Social Media: ऑस्ट्रेलिया में बैन के बावजूद आसानी से सिस्टम को चकमा दे रहे बच्चे, टेक कंपनियों पर लटकी तलवार

Wed, 01 Apr 2026 10:58 AM IST
Suyash Pandey टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Australia Social Media Ban Under 16: ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया इस्तेमाल पर भले ही रोक लग गई हो लेकिन फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, टिकटॉक और यूट्यूब जैसी दिग्गज कंपनियां बच्चों को अपने प्लेटफॉर्म से दूर रखने में नाकाम साबित हो रही हैं। एज वेरिफिकेशन यानी उम्र जांचने वाले सिस्टम में खामियों के चलते अब ऑस्ट्रेलियाई सरकार इन टेक कंपनियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई और भारी-भरकम जुर्माना लगाने की तैयारी कर रही है। 
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सोशल मीडिया बैन (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : एआई
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विस्तार
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ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन करने का कानून 10 दिसंबर से लागू हो चुका है। लेकिन अब खबर है कि कई बड़ी टेक कंपनियां इस नियम का सख्ती से पालन नहीं कर रही हैं। ऑस्ट्रेलिया का ऑनलाइन सेफ्टी वॉचडॉग (ईसेफ्टी) अब फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, टिकटॉक और यूट्यूब को कोर्ट में घसीटने की तैयारी कर रहा है। आइए समझते हैं कि पूरा विवाद क्या है और टेक कंपनियों की मुश्किलें क्यों बढ़ रही हैं।

क्या है पूरा मामला?

ऑस्ट्रेलिया की ईसेफ्टी कमिश्नर जूली इनमैन ग्रांट ने हाल ही में नियमों के पालन से जुड़ी अपनी पहली कंप्लायंस रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, नए कानून के लागू होने के बाद से करीब 50 लाख ऑस्ट्रेलियाई अकाउंट्स बंद तो किए गए हैं, लेकिन इसके बावजूद एक बड़ी संख्या में बच्चे अभी भी इन प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद हैं। दरअसल, बच्चे न सिर्फ नए अकाउंट बना रहे हैं, बल्कि इन एप्स के उम्र जांचने वाले सिस्टम को भी बेहद आसानी से चकमा दे रहे हैं। इस स्थिति को देखते हुए ईसेफ्टी ने 10 में से 5 प्लेटफार्म्स की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर चिंता जताई है। उनका स्पष्ट मानना है कि इन कंपनियों ने बच्चों को प्लेटफॉर्म से दूर रखने के लिए जरूरी और उचित कदम नहीं उठाए हैं। नियमों की इस अनदेखी के चलते, अगर ये टेक कंपनियां कोर्ट में दोषी पाई जाती हैं तो उन पर 49.5 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक का भारी-भरकम जुर्माना लगाया जा सकता है।

कौन से एप्स सेफ हैं और किन पर लटकी है तलवार?

ऑस्ट्रेलियाई ऑनलाइन सेफ्टी वॉचडॉग की इस बड़ी कार्रवाई ने टेक जगत में हलचल मचा दी है। फिलहाल, जांच के घेरे में फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, टिकटॉक और यूट्यूब जैसे दिग्गज प्लेटफॉर्म्स शामिल हैं। इन पर नियमों की अनदेखी का आरोप है। दूसरी ओर, रेडिट, एक्स, किक, थ्रेड्स और ट्विच जैसे एप्स को फिलहाल राहत मिली हुई है और वे जांच के दायरे से बाहर हैं।

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वॉचडॉग की जांच में सामने आया है कि जिन एप्स पर कार्रवाई की तैयारी है, उनके सिस्टम में कई गंभीर खामियां हैं। उदाहरण के तौर पर, ये प्लेटफॉर्म्स यूजर्स को उम्र वेरिफिकेशन पास करने के लिए अनलिमिटेड चांस यानी बार-बार कोशिश करने का मौका दे रहे हैं। इससे बच्चों के लिए सिस्टम को चकमा देना और भी आसान हो गया है।

सरकार का कंपनियों पर गंभीर आरोप

ऑस्ट्रेलिया की संचार मंत्री अनिका वेल्स ने टेक कंपनियों के रवैये पर कड़ा प्रहार करते हुए उन पर जानबूझकर नियमों की अनदेखी करने का आरोप लगाया है। उनका स्पष्ट कहना है कि सोशल मीडिया कंपनियां केवल दिखावे के लिए काम कर रही हैं क्योंकि उनकी असल मंशा इस कानून को नाकाम करने की है। वेल्स के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया का यह कदम दुनिया में अपनी तरह का पहला और अनूठा कानून है और यही बात इन कंपनियों को डरा रही है। उन्हें डर है कि यदि ऑस्ट्रेलिया में यह प्रयोग सफल हो गया तो दुनिया के अन्य देश भी इसी राह पर चल पड़ेंगे और बच्चों की सुरक्षा के लिए ऐसे ही सख्त नियम लागू करना शुरू कर देंगे।

क्या कह रही हैं टेक कंपनियां?

इस पूरे विवाद पर टेक दिग्गजों ने भी अपनी सफाई पेश की है। मेटा (फेसबुक और इंस्टाग्राम) का कहना है कि वे नियमों के पालन के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि इंटरनेट पर किसी यूजर की सटीक उम्र का पता लगाना पूरी टेक इंडस्ट्री के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। वहीं, स्नैपचैट ने अपना पक्ष रखते हुए दावा किया है कि वे पहले से ही कड़े कदम उठा रहे हैं और अब तक नियमों के तहत करीब 4 लाख 50 हजार अकाउंट्स लॉक कर चुके हैं। दूसरी ओर, टिकटॉक और गूगल (यूट्यूब) ने फिलहाल इस मुद्दे पर चुप्पी साधी हुई है और कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है।

इस खींचतान के बीच टेक एक्सपर्ट्स का मानना है कि अब गेंद पूरी तरह से कोर्ट के पाले में है। अदालत को ही यह तय करना होगा कि कंपनियों के जरिए उठाए गए कदम पर्याप्त हैं या नहीं, क्योंकि हकीकत यह है कि उम्र जांचने वाली कोई भी तकनीक फिलहाल 100 फीसदी अचूक नहीं है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि कानून और तकनीक के इस टकराव में जीत किसकी होती है।

आगे क्या होगा?

एक तरफ ईसेफ्टी वॉचडॉग इन बड़ी कंपनियों पर केस करने की तैयारी कर रहा है तो दूसरी तरफ इस कानून का विरोध भी शुरू हो गया है। मशहूर प्लेटफॉर्म रेडिट और एक प्राइवेसी राइट्स ग्रुप ने ऑस्ट्रेलिया के हाई कोर्ट में इस बैन को चुनौती दी है। उनका तर्क है कि यह कानून असंवैधानिक है और लोगों की राजनीतिक अभिव्यक्ति की आजादी छीनता है। इस मामले की शुरुआती सुनवाई 21 मई को होगी।

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