व्यवसायिक भूमि का ढ़ाल हमेशा उत्तर या पूर्व की ओर रखें। इस तरह औद्योगिक इकाईयों की मुख्य फैक्ट्री के भवन जहाँ उत्पादन होता है, के छत का झुकाव भी उत्तर और पूर्व में रखना श्रेष्ठ होता है। व्यवसायिक परिसर के उत्तर, पूर्व या उत्तर-पूर्व में कुँआ, हैण्डपम्प, भूमिगत जल व्यवस्था, फव्वारा आदि रखना वास्तु में जल तत्व को संरक्षित करता है और सकारात्मक वातावरण को उत्पन्न करता है। छत पर पानी का टैंक या संचयन पश्चिम दिशा, या दक्षिण-पश्चिम दिशा में रखना चाहिए। फैक्ट्री या उद्योग में काम करने वाले कर्मचारी एवं मजदूरों के लिए कमरा हमेशा पश्चिम क्षेत्र में बनाना चाहिए।
ऐसा करने से कर्मचारी निष्ठा से कार्यों को सम्पादित करते हैं। व्यवसायिक परिसर में स्नानगर के लिए सबसे उपयुक्त स्थान पूर्व दिशा है। किसी भी व्यवसायिक प्रतिष्ठान के मुख्य द्वार के बाहर कचरा, गंदे पानी का नाला, खड्डा नहीं होना चाहिए। यह उद्योग की संपन्नता को रोककर उद्योगपति को कर्जदार बना देता है। उद्योगपति को खुद नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) क्षेत्र में बैठना चाहिए ताकि फैक्ट्री पर उनका स्वामित्व एवं नियंत्रण बना रहें। मशीनें जो ज्यादा स्थान घेरे या वजन में भारी हो, उन्हें ठीक नैऋत्य दिशा के मध्य से दक्षिण या पश्चिम में स्थापित करना चाहिए।
वास्तुशास्त्र के अनुसार व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में शुभ ऊर्जा बढ़ाने हेतु कुछ मुख्य निम्र बिन्दुओं को सदैव ध्यान में रखना चाहिए :-
१. पीली मिट्टी वाला भूखण्ड हो तो दुकान एंव ऑफिस आदि के लिए शुभ होता है।
२. काली मिट्टी वाला भूखण्ड औद्योगिक कार्यो के लिए शुभ है।
३. प्रतिष्ठान इस प्रकार बनाया जाए कि भूखण्ड के पूर्व और उत्तर अधिक से अधिक खुला हों।
४. प्रतिष्ठान परिसर में मंदिर उत्तर पूर्व दिशा में बनाना चाहिए।
५. सेल्समैन या रिसेप्शन का कर्मचारी के बैठने की व्यवस्था में वह पूर्व या
उत्तर दिशा की तरफ देखता हुआ होना चाहिए।
६. स्वामी कक्ष को प्रशासनिक भवन के नैऋव्य में बनाना चाहिए।
७. मालिक और कर्मचारी के बैठने के स्थान के ऊपर लोहे का बीम नहीं होना चाहिए।
८. भूखण्ड को दक्षिण-पश्चिम की ओर से ऊँचा तथा ईशान कोण की ओर से नीचा रखना चाहिए।
९. एकाउन्ट्स, खजांन्ची, लेखा विभाग या धन के लेन देन सम्बन्धि कक्ष उत्तर दिशा में रखें।
१०. कॉनफ्रेन्स रूम पूर्व दिशा में अत्यधिक शुभ रहता है।