कुंडली का पहला भाव जिसे लग्न कहा जाता है,यह बहुत ही महत्वपूर्ण भाव होता है। पहला भाव जातक का स्वयं का शरीर होता है। इस भाव से जातक के स्वभाव और शरीर का विचार किया जाता है। अगर कुंडली के पहले भाव में शुभ ग्रह विराजमान होते हैं तो व्यक्ति आकर्षक, अच्छा स्वास्थ्य, सुंदर शरीर, अच्छी बुद्धि और जीवन में मान-सम्मान वाला होता है। इसके विपरीत अगर किसी जातक की कुंडली के लग्न भाव में अशुभ ग्रह है या फिर ग्रह पीड़ित है तो व्यक्ति का स्वभाव अंहकारी, क्रोधी, मानसिक पीड़ा से ग्रस्त रहने वाला और आलसी प्रवृति का होता है।
दूसरा भाव
वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली का दूसरा भाव कुटुंब यानी परिवार, धन और वाणी का होता है। कुंडली के दूसरे भाव में शुभ ग्रह होने से व्यक्ति धन का संचय करने वाला, अच्छी वाणी बोलने वाला, सौम्य स्वभाव और बहुकुटुब वाला होता है। वही अगर कुंडली के दूसरे भाव में अशुभ ग्रह आकर बैठ जाए तो व्यक्ति की वाणी अच्छी नहीं होती है। व्यक्ति का परिवार के सदस्यों से लड़ाई-झगड़ा चलता रहता है और जातक धन की कमी से जूझता है।
तीसरा भाव
कुंडली के तीसरे भाव से व्यक्ति के साहस और पराक्रम का विचार किया जाता है। इसके अलावा यह भाव भाई-बहन का होता है। तीसरे भाव में क्रूर या पापी ग्रह बैठने पर व्यक्ति बहुत ही पराक्रमी और मेहनती होता है। तीसरे भाव में क्रूर ग्रह के बैठने से यह भाव पाप से युक्त हो जाता लेकिन जो पापी ग्रह बैठता है वह जातक को चुनौतियों से लड़ने का साहस और पराक्रम प्रदान करता है। इस भाव में पापी ग्रह के बैठने से व्यक्ति को साहसी बनता है जबकि शुभ ग्रह के बैठने से व्यक्ति आलसी स्वभाव का होता है।
चौथा भाव
कुंडली का चौथा भाव माता, सुख, धन, भूमि, भवन और वाहन का होता है। जब भी इस भाव में शुभ ग्रह बैठते हैं या शुभ ग्रहों की द्दष्टि होती है तब व्यक्ति को इन भाव से संबंधित सभी तरह के सुखों की प्राप्ति होती है। वहीं दूसरी ओर कुंडली के चौथे भाव में अशुभ ग्रह के होने से व्यक्ति के जीवन में भूमि, भवन, वाहन और माता के सुख में कमी आती है।
पांचवां भाव
कुंडली का पांचवां भाव त्रिकोण का भाव होता है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र में केंद्र और त्रिकोण के भाव को बहुत ही शुभ माना जाता है। इस भाव से जातक के शिक्षा, संतान और वंश का विचार किया जाता है। अगर कुंडली के इस भाव में शुभ ग्रह हों या इन पर शुभ ग्रहों की द्दष्टि पड़ रही हो तो जातक को शिक्षा के क्षेत्र में काफी अच्छी सफलता मिलती है। जातक उच्च से उच्च शिक्षा को हासिल करने में कामयाब होता है। वहीं अगर इस भाव में अशुभ ग्रह बैठते हैं जातक की शिक्षा का स्तर अच्छा नहीं होता है और व्यक्ति के संतान के सुख में कमी आती है।
छठा भाव
कुंडली का छठा भाव काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष में इस भाव को अच्छा नहीं माना जाता है। कुंडली का छठा भाव रोग, शत्रु और परेशानियों का होता है। इस भाव में शुभ ग्रह के बैठने से शुभ ग्रहों का शुभ प्रभाव ज्यादा नहीं मिल पाता है। वहीं अगर इस भाव में कोई क्रूर या पापी ग्रह बैठता है तो शत्रुओं पर विजय प्राप्त होता है और इस भाव से शत्रुहंता योग का निर्माण होता है।
सप्तम भाव
कुंडली के सातवें भाव से साझेदारी और जीवनसाथी का विचार किया जाता है। जिन जातकों की कुंडली के सातवें भाव में शुभ ग्रह बैठते हैं या फिर अन्य भावों से दूसरे ग्रहों की शुभ द्दष्टि पड़ती है तो सुंदर जीवनसाथी और व्यापार में साझेदारी से अच्छे सहयोग की प्राप्ति होती है। वहीं अगर इस भाव में अशुभ ग्रह बैठते हों तो वैवाहिक जीवन में तनाव, कष्ट और सुख में कमी आती है।
अष्टम भाव
कुंडली का आठवां भाव मृत्यु, तंत्र-मंत्र, ज्योतिष और गूढ़ विद्या का भाव होता है। इस भाव में शुभ ग्रह के बैठने से अचानक से धन लाभ को बताता है। इस विपरीत कुंडली के इस भाव में अशुभ ग्रह के बैठने पर व्यक्ति को धन और संपत्ति की हानि होती है।
नवम भाव
कुंडली का नौवां भाव त्रिकोण का भाव होता है। इस भाव से भाग्य, पिता और धार्मिक क्रियाकालाप का विचार किया जाता है। जब इस भाव में शुभ ग्रह का प्रभाव होता है तो व्यक्ति धर्म-कर्म में रूचि लेता है। व्यक्ति के सौभाग्य और कार्यों में सफलता में वृद्धि होती है। वहीं इस भाव में अशुभ ग्रह का प्रभाव होने पर व्यक्ति के पिता के लिए अच्छा नहीं माना जाता है। नवम भाव में अशुभ ग्रह होने पर व्यक्ति धार्मिक कार्य में रुचि नहीं लेता है।
दशम भाव
कुंडली का दशम भाव कर्म का माना गया है। जिन जातकों की कुंडली के इस भाव में शुभ ग्रह होते हैं ऐसा व्यक्ति किसी उच्च पद को प्राप्त करता है। नौकरी और व्यवसाय में अपार धन अर्जित करता है। भौतिक सुखों की प्राप्ति करता है। वहीं अगर इस भाव में अशुभ या क्रूर ग्रह होते हैं व्यक्ति के सुखों में कमी, नौकरी-व्यापार में चिंता बनी रहती है। व्यक्ति को अपयश का सामना करना पड़ता है।
एकादश भाव
कुंडली का एकादश भाव लाभ और इच्छापूर्ति का भाव होता है। अगर किसी जातक के एकादश भाव में शुभ ग्रह विराजमान होते हैं तो व्यक्ति को अनेकों प्रकार के सुख, लाभ, हर एक इच्छाओं की पूर्ति और साहस में वृद्धि होती है। वहीं अगर कुंडली के इस भाव में अगर अशुभ ग्रह बैठ जाते हैं तो व्यक्ति के लाभ पाने की इच्छाओं में कमी और तरह-तरह की बाधाएं आति है। इसके अलावा नौकरी में हानि होती है।
द्वादश भाव
कुंडली का 12वां भाव जिसे द्वादश भाव कहते हैं यह व्यय का भाव होता है। कुंडली के इस भाव में शुभ ग्रह के बैठने से जातक को अच्छे और सार्थक कार्यों में खर्च कराते हैं। वहीं अगर कुंडली के इस भाव में अगर अशुभ ग्रह होते हैं जो जातक बेफजूल के खर्चों में लिप्त होता है।
नोट- कुंडली के हर एक भाव में शुभ और अशुभ ग्रहों का फलादेश के साथ-साथ वैदिक ज्योतिष शास्त्र के कई दूसरे विशेष नियमों का भी प्रयोग करके संपूर्ण फलादेश किया जाना चाहिए।