वैदिक ज्योतिष शास्त्र में जन्म कुंडली के नवम भाव को भाग्य का भाव कहा जाता है। इस भाव से जातक के भाग्य और धर्म के प्रति रूचि के बारे में विचार किया जाता है। नवम भाव से व्यक्ति के धार्मिक रूचि से इस धर्म का भाव भी कहते हैं। नवम भाव कुंडली का त्रिकोण भाव होता है और यह कुंडली के सबसे मजबूत भाव में से एक होता है। जिन जातकों की कुंडली का नवम भाव मजबूत होता है व्यक्ति भाग्य का भरपूर साथ मिलता है। इस भाव के मजबूत होने पर जातक हर क्षेत्र में तरक्की, धन संपदा और पद-प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है। कुंडली के इस भाव से भाग्य के अलावा पूर्व भाग्य, धर्म, दैवी उपासना, पिता, शुभ कार्य और पौत्र को दर्शाता है।
कुंडली के नवम भाव से जातक के पिछले जन्मों में किए गए अच्छे कार्य का फल वर्तमान जीवन में भाग्य के रूप में हासिल होता है। इस भाव से जातक सफलता की ऊंचाइयों का प्राप्त करता है। कालपुरुष की कुंडली में इस भाव का स्वामी देवगुरु बृहस्पति ग्रह होते है और यह धर्म का भाव है। कुंडली के नवम भाव से उच्छ शिक्षा, ज्ञान और वैचारिक क्षमता का आंकलन किया जाता है। कुंडली के नवम भाव से व्यक्ति का धार्मिक जीवन, भाग्य, राजयोग, संतान, गुरु, पिता और धार्मिक यात्राओं का दर्शाया जाता है।
प्रभु कृपा की प्राप्ति का भाव जन्मकुंडली का नवम भाव को माना जाता है। कुंडली के नवम भाव से जातक के भाग्य के बारे में विचार किया जाता है। कुंडली के नवम भाव का विस्तार पूर्वक अध्ययन करने पर जातक का भाग्य कैसा है। किस उम्र में जातक का भाग्योदय होगा, सुख-संपन्नता भाग्य के बल पर कब मिलेगा, पिता और गुरु के साथ संबंध कैसा रहेगा इन सब बातों का बड़ी ही आसानी के साथ मालूम किया जा सकता है। नवम भाव के स्वामी को भाग्येश या फिर नवमेश कहा जाता है। अगर कुंडली के नवम भाव में शुभ ग्रह बैठा है या फिर नवमेश की स्थिति कुंडली में शुभ है तो जातक को भाग्य का अच्छा साथ मिलता है। वहीं अगर कुंडली इस भाव का संबंध शत्रु राशि, नीच राशि, पाप ग्रह और पाप ग्रहों की द्दष्टि हो जातक के मान-सम्मान और भाग्य में गिरावट देखने को मिलती है।
कुंडली के नवम भाव के स्वामी की दशा और अंतर्दशा में यात्राओं का योग बनता है। अगर इस भाव का स्वामी बलवान होकर और शुभ ग्रहों की युति और शुभ ग्रहों की द्दष्ट से हो तो जातक पर दैव कृपा बरसती है। अगर नवम भाव का स्वामी बलवान होकर दशम भाव जो कर्म का भाव होता वहां पर बैठ जाय तो ऐसा जातक अपने जीवन में बड़े से बड़ा पद, प्रतिष्ठा और सम्मान को प्राप्त करता है।
कुंडली के इस भाव से बनने वाला राजयोग
कुंडली के नवम भाव को त्रिकोण और दशम भाव को केंद्र भाव माना जाता है। इस विष्णु-लक्ष्मी भाव भी कहते हैं। ऋषि पराशर के अनुसार कुंडली के नवम भाव को सबसे शुभ भावों में से एक माना गया है। इस भाव के स्वामी का संबंध यदि दशम भाव व दशमेश के साथ हो तो मनुष्य अत्यंत भाग्यशाली, धनी, प्रतिष्ठित और राजयोग का सुख लेने वाला होता है। नवम भाव त्रिकोण भावों में सबसे प्रमुख व शक्तिशाली त्रिकोण है। यह एक लक्ष्मी स्थान है वहीं दशम भाव केंद्र भावों में से सबसे प्रमुख और शक्तिशाली केंद्र है। यह एक विष्णु स्थान भी है। ऐसे में अगर नवम और दशम भाव का संबंध या फिर नवमेश और दशमेश का संबंध बने तो यह सबसे शक्तिशाली राजयोग होता है। इससे धर्मकर्माधिपति राजयोग का निर्माण होता है।