ग्रहों के वक्री होने का जिक्र आते ही मन में तमाम आशंकाएं पैदा होने लगती हैं। मसलन अब क्या जीवन में परेशानियां शुरु हो जाएंगी या फिर कोई बड़ी विपत्ति आएगी। मन में बार-बार यही आशंका होती है कि प्रारंभ किया गया काम या फिर बनाई गई योजना में कोई खलल तो नहीं आएगा। लेकिन ग्रहों का वक्री होने का तात्पर्य सिर्फ अशुभ ही होना नहीं है। कुछ परिस्थितियों में ग्रहों का वक्री होना आपके जीवन में खुशी का संचार का कारण भी बनता है।
वक्री ग्रहों के क्या है मायने
जिस प्रकार सूर्योदय और सूर्यास्त नहीं होता केवल दृश्य मान्यता ही है। कहने का तात्पर्य पृथ्वी की अपनी धुरी पर स्वगति सूर्योदय और सूर्यास्त का बोध कराती है। वैसे ही कोई भी ग्रह वक्री नहीं होता बल्कि कभी विपरीत दिशा में, कभी सीधा, कभी धीमा, और कभी तीव्र गति से चलता हुआ प्रतीत होता है।
ग्रह कभी भी विपरीत नहीं चलते
कल्पना कीजिये कि तीन-चार लोग एक सीध में गोल घूमने वाले अलग-अलग झूले पर बैठे हैं तथा चारों झूले अलग-अलग गति से घूम रहे हैं, ऐसे में एक व्यक्ति को दूसरा कभी तेज दिखाई देगा, कभी उलटा चलता हुआ दिखाई देगा और कभी सीधा चलता हुआ दिखाई देगा जबकि सब के सब एक ही धुरी पर एक ही दिशा में घूम रहे होते हैं। इसी कारण से पृथ्वी से हमें देखने पर बाकी अन्य ग्रह कभी मार्गी प्रतीत होंगे तो कभी वक्री प्रतीत होंगे व कभी तेज गति से घूमते हुए नजर आएंगे।
इस कारण होता है भ्रम
जिस प्रकार सूर्य व चन्द्रमा के अंतर से तिथि बनती है उसी प्रकार ग्रहों व पृथ्वी की गति के भेद से ग्रहों की वक्री आदि गतियां बनती हैं। इसे ऐसे समझें — पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा लगभग 365 दिन में करती है, अर्थात दस दिनों में लगभग दस अंश की गति होती है। जबकि मंगल सूर्य की परिक्रमा 686 दिवस में पूर्ण करता है। जिसके फलस्वरूप उसकी गति 19 दिन में दस अंश होती है और इसी गति की असमानता की वजह से पृथ्वी से देखने पर ग्रह सीधे या उल्टे चलते हुए प्रतीत होते हैं। यह भ्रम सूर्य से बाकी ग्रहों को देखने में समाप्त हो जायेगा।
सूर्य व चंद्रमा कभी नहीं होते वक्री
सूर्य व चन्द्रमा कभी वक्री नहीं होते क्योंकि सूर्य स्थिर है और उसकी गतिशीलता नक्षत्र की गतिशीलता के कारण प्रतीत होती है और चन्द्रमा अन्य ग्रहों की भांति सूर्य की परिक्रमा न करके पृथ्वी की परिक्रमा करता है।
राहु-केतु हमेशा होते हैं वक्री
राहु-केतु सदा वक्री होते हैं हमारे प्राचीन ग्रंथों में राहु और केतु का नाम 'पात' है, अर्थात दो वृत्तों का एक दूसरे को काटने का स्थान। क्रांति वृत्त सूर्य का भचक्र में मार्ग है और जिस मार्ग पर भचक्र में चन्द्रमा चलते हैं उसे चंद्रकक्षा कहा जाता है। यह कक्षाएं जिन स्थानों पर एक-दूसरे से मिलती या काटती हुई प्रतीत होती हैं, वह राहु और केतु कहलाती हैं।
इस कारण देता है अधिक फल
पृथ्वी के अधिकतम निकट जब कोई ग्रह होगा तो वह वक्री होगा तथा अपनी प्रकृति अनुसार अधिक फलदायी होगा।
वक्रिणस्तु महावीर्या: राज्यप्रदा: ग्रहा:।
पापा: व्यसनदा: पुंसा कुर्वन्ति च वृथाटनम्॥
ऐसे होता है बली
क्योंकि वक्र गतित ग्रह का बल चेष्टाबली मन गया है, जो कि निसंदेह बढ़ा हुआ होता है, लेकिन फल अनियमित और असंतुलित हो जाता है, अर्थात किसी क्षेत्र में अत्याधिक व कहीं पर बहुत कम फल देता है।
हित्वा वक्रं रिपुगृहगतैहीर्यते स्वत्रिभागः
अत: वक्री ग्रह अधिक बली व आयु बढ़ाने वाला होता है।
इस स्थिति में मिलेगा शुभ फल
उच्च ग्रह यदि वक्री है तो वह नीच राशि में स्थित होने के समान फल देता है।
उच्चराशौ विलोमे यत्फलं नान्यैरिहेष्यते।
कालस्याति बहु त्वाच्च तस्मात्स्वोच्चेऽतिवक्रिते।।
यदि ग्रह नीच में स्थित होकर वक्री हो तो वह शुभ फल देगा। वक्री ग्रह के साथ प्रत्येक ग्रह भी उसकी सान्निध्य में अतिरिक्त बल पाकर बलवान हो जाता है।